किसी ने गाय से पूछा कि उसको गौरक्षकों की माता बनना है कि नहीं?
“दैनिक खोज खबर”:-ख़बर चल रही है कि तथाकथित गौरक्षकों के समूह ने एक हाईवे पर पिकअप ट्रक में गाय और बछड़ों को ले जा रहे कुछ लोगों को बुरी तरीक़े से पीटा, जिससे एक आदमी की मौत हो गई। उसके बाद पीटने वाले हिन्दू हो गए, पिटने और मरने वाले मुसलमान। उसके बाद मरने वाला, और पिटने वाले, डेयरी का व्यापार करने वाले किसान निकले, और पीटने वाले विश्व हिन्दू परिषद तथा बजरंग दल के गौरक्षक।
(Ajeet Bharti ) न्यूज स्रोत से ख़बर पढें…..

उसके बाद जो हो रहा है वो और भी विचित्र है कि गृह मंत्री ने कहा कि मारपीट, कानून को हाथ में लेना ग़लत है लेकिन किसी को गाय ले जाते देख रोकना ग़ैरक़ानूनी नहीं है। टेक्निकली ये बात सही है लेकिन सड़कों पर जाते वाहनों को रोक कर उससे रसीद माँगने की आज़ादी किसने और किसको दी है? फिर तो कल को मेरी मोटरसाइकिल रोक कर मुझसे कोई भी लाइसेंस माँग ले, और ना होने पर रॉड से पीटे?
दूसरी बात है, एक हत्या का ‘हिन्दुओं द्वारा मुसलमान की हत्या’ ऐसे बताया जा रहा है जैसे कि ऐसे गौरक्षकों ने पहले किसी हिन्दू को नहीं मारा हो। जब आप इसे हिन्दू द्वारा मुसलमान की हत्या का रंग देंगे, आप मुख्य मुद्दे से भटक कर अपनी ही बात को कमज़ोर कर रहे हैं कि ये गौरक्षक हैं कौन और इन्हें पनाह कौन दे रहा है?
तमाम वेबसाइटों, खासकर विदेशी, पर हेडलाइन से लेकर अंदर तक इसे साम्प्रदायिक रंग दिया गया है और फिर इसे भारत और हिन्दुओं की लगातार जीतती सरकारों से जोड़ दिया गया है। इन सब बातों में हम ये भूल जाते हैं कि जितने बम और आतंकी हमले होते हैं उनको आतंकवादी अंजाम देते हैं, मुसलमान नहीं।
मुद्दा ये है कि गाय ले जाते हुए लोगों को सड़क पर रोक कर दिनदहाड़े मार दिया जाता है और आपके पास समय है इसको हिन्दू बनाम मुसलमान बनाने का? मुद्दा ये है कि आज ये लोग सड़कों पर गाड़ियाँ रोक रहे हैं, कल को आपके बाड़े में जाकर चेक करेंगे कि कितना दूध देती है, और क्या खिलाते हैं आप गायों को। अगर आपका चारा उनके स्तर का नहीं है तो फिर वो आपको घर से खींच कर भी मार सकते हैं।
यही तो गौरक्षकों का धर्म है। ये गुण्डागर्दी और ‘काका हमर विधायक हम त नहीं डराएम हो’ वाली बात है, इसका ना तो धर्म से कोई लेना-देना है, ना ही जागरुकता से। अगर होता तो ये लोग पॉलिथिन खाती गायों को अपने घर में ले जाते और उसकी देखभाल करते।
गाय हिन्दुओं की माता है, ये मानने का फ़ैसला उस हिन्दू का है, किसी समूह का नहीं। ना ही सरकारों ने ऐसे कानून बनाए हैं कि गाय को माता नहीं मानने वालों को जान से मार दीजिए। गुजरात के ऊना में दलितों को पीटा गया था। अख़लाक़ की हत्या हुई। पहलू खान को मार दिया गया। और ऐसी तमाम ख़बरें हैं जिसमें सड़कों पर रोक कर लोगों को बेरहमी से पीटा गया है। सब गाय के माता होने के नाम पर।
हमारी माता कौन है वो हम जानेंगे, वो मुझे बेरोज़गार और लक्ष्यहीन चिरकुट गुंडों का समूह नहीं बताएगा। जिनको ये लग रहा है कि ‘आहा! मज़ा आ गया, भले मारा मुसलमानों को’, तो वो ये बात ध्यान से रट लें कि अगर आगे भी यही होता रहा तो फिर आप वैसे ही मारे जाएँगे जैसे कि आइसिस वाले आए दिन मुसलमानों को ही बम से उड़ाते हैं।
आपको हिन्दू राष्ट्र चाहिए ना, तो मैं बता देता हूँ वो कैसा होगा। वो हिन्दू राष्ट्र वैसा ही हिन्दू राष्ट्र होगा जैसा इस्लामी पाकिस्तान है। आपके मंदिर पर एक विराट हिन्दू, सच्चा हिन्दू इसलिए बम मार देगा क्योंकि आप शिव की पूजा के वक़्त घंटी कम ज़ोर से बजाते हैं। आपकी बहन को खींच कर उसका बलात्कार इसलिए हो जाएगा क्योंकि वो मंगलवार को व्रत नहीं रखती। आपकी माँ के हाथ इसलिए काट दिए जाएँगे क्योंकि उसने साँझ का दिया जलाने में देर कर दी। और आपको इसलिए रॉड से पीटकर मार दिया जाएगा क्योंकि आपने नियम से नहाया नहीं है।
ये ज़रूर लग रहा होगा कि मैं क्या बोल रहा हूँ। तो याद रखिए ये पूरा प्रोसेस इतना धीमा होता है कि आपका पाला अगर जीतता रहा तो आपको वो सही लगने लगेगा। आज गौरक्षक किसी को, चाहे वो किसी भी धर्म या जाति का हो, पीटते हैं, जान से मार देते हैं, और आपको लगता है कि ‘सही हुआ, ऐसे लोगों को तो मार ही देना चाहिए’ तो आपको ऊपर का पैराग्राफ़ दोबारा पढ़ना चाहिए।
गाय सबकी माता नहीं है। कभी उसकी आँखों को देखिए और ख़ुद से पूछिए कि इतनी करूणामयी आँखों वाली गाय क्या ये बर्दाश्त करेगी कि आपने उसके नाम पर किसी की जान ले ली? गाय के पीठ पर हाथ फेरते वक़्त सोचिएगा कि क्या इस पाप का भागी आप उस माता को नहीं बना रहे जिसका आपकी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं?
जिसने गाय पाला है, उसको अपने परिवार का हिस्सा माना है, वो उसके नाम पर किसी को मार नहीं सकता। ये हत्याएँ, ये मारपीट धार्मिक नहीं हैं, ये सत्ता में अपने लोगों के होने का उन्माद है जिसका अंत बहुत भयावह है। गाय चाहे कत्लगाहों में मरे, किसी के बर्गर में मिले, किसी की बिरयानी में हो, या किसी मुसहर की थाली में, मुझे इससे तब तक आपत्ति नहीं है जब तक वो मेरी गाय नहीं है, जिसे किसी ने ज़बरदस्ती चुरा कर काट दिया हो, या जानबूझकर मुझे उकसाने के लिए मेरे सामने, मेरे घर में बैठकर खा रहा हो।
गाय को माता मानना और उसके नाम पर किसी की जान लेना उतना ही उन्मादी और मूर्खतापूर्ण है, जितना क़ुरान के पन्ने फाड़ने वाले को घेरकर मार देना। गोमाँस खाने पर किसी को खींचकर पीटना वैसी ही आतंकी कार्रवाई है, जैसी सुन्नियों द्वारा शिया की मस्जिदों पर बम गिराना। बीफ़ ईटिंग फ़ेस्टिवल कराना उतना ही घृणित और उकसाऊ कार्य है जितना शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्ट द्वारा देवताओं, पैगम्बरों के नंगे कार्टून बनाना।
सामूहिक भावनाएँ तभी आहत होती हैं जब सामने वाले की नीयत आपको आहत करना हो। अगर आपकी भावनाएँ ट्रक पर गाय और उसके बछड़ों को लादकर ले जाने से आहत हो रही है, तो आपका मक़सद अपने पागलपन को एक कारण देने भर जैसा है। आपको गाय या हिन्दू धर्म से कोई ख़ास मतलब नहीं है, आपको ये दिखाना है कि काम आपके हिसाब से होगा, क्योंकि आपकी गुंडई से सत्ता पाने वाले विधायक हो गए हैं और वो आपको बचा ले जाएँगे।




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