

दैनिक खोज खबर/पटना। भगवान जगन्नाथ बड़े उत्सवधर्मी हैं। मन्दिर की वार्षिक आयोजन-सूची में सैकड़ों उत्सवों की रूपरेखा बनाई जाती है, जिनमें कि 108 पर्व-उत्सव और 27 यात्रा-उपयात्रा। लोक-शास्त्र के ऐक्य की बात करें, तो स्कन्दपुराण में भगवान जगन्नाथ की बारह-मासी कुल तेरह उत्सव-यात्राओं का उल्लेख मिलता है। अधिक पुरातन शास्त्रों- यथा ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण व नारदपुराण- में ज्येष्ठ मास की स्नानयात्रा एवं रथयात्रा के ही दो उल्लेख मिला करते हैं। अर्थात् ये सर्वप्राचीन उत्सव-द्वय हैं। ये दोनों उत्सव श्रीमन्दिर के आदि-प्रणेता महाराज इन्द्रद्युम्न की धरोहर हैं, दुष्यंत-शकुंतला-नंदन भरत के यशस्वी पुत्र महाराज इन्द्रद्युम्न। भगवान जगन्नाथ के मन्दिर व विग्रह की स्थापना के पश्चात् महाराज इन्द्रद्युम्न ने तीन वर मांगे थे। महारानी गुंडिचा को आशा थी कि महाराज पुत्र की कामना भी अवश्य करेंगे, किन्तु वैसा नहीं हुआ ! सो, भगवान ने उनकी आंतरिक इच्छा को फलीभूत करते हुए कहा- कि हम प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष में आपके यहाँ आएँगे और सात दिन निवास करेंगे। वस्तुतः यह आषाढ़ शुक्लपक्षीय प्रवास नीलपर्वत पर बने श्रीमन्दिर से सुन्दरपर्वत पर बने महाराज इन्द्रद्युम्न के महल की ओर होता है। प्रभु वहीं जाकर निवास करते हैं। वर्तमान में, महल को गुंडिचा देवी मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इसे महावेदी भी कहा जाता है, श्रीविग्रहों का आविर्भाव-स्थल।इस तरह आरंभ हुआ प्रवास, आज रथयात्रा के रूप में जाना जाता है। प्राचीन काल में- नील व सुंदर- दोनों पर्वतों के मध्य एक मालिनी नदी प्रवाहित थी ! सो, कुल छः रथों का निर्माण किया जाता था, तीन रथ नीलाचल में और तीन सुन्दराचल में।ऐसी मान्यता है कि 1250 ई० के आसपास, उत्कल के महाराज वीर नरसिंह देव ने मालिनी नदी पर रेत आदि से सेतु का निर्माण करवाया और छः रथों के स्थान पर तीन ही रथों की परिपाटी चल निकली।
यात्रा हेतु प्रतिवर्ष नवीन रथों का निर्माण किया जाता है, जिसकी प्रक्रिया का आरंभ ठीक चार मास पूर्व वसन्त पंचमी को हो जाता है। ठीक इसी दिन मन्दिर सेवक उड़ीसा के दसपल्ला जिले में स्थिति रणपुर जंगल का प्रवास करते हैं और वहाँ से रथ-निर्माण हेतु यथा-योग्य लकड़ी संग्रह कर के लाते हैं। काष्ठ के इस संग्रह को छीलने, सुखाने, काटने और तराशने के लिए तक़रीबन दो मास का समय मिलता है और फिर अखतीज अर्थात् वैशाख शुक्ल तृतीया को काष्ठ-संयोजन और रथों की रंगाई पुताई का अंतिम पर्व सम्पन्न होता है।यों तो एक रथ के कुल चौंतीस भाग होते हैं, किन्तु वे सभी चौंतीस प्रत्येक वर्ष नहीं बनाए जाते, यथा- पार्श्व-देवता, घोड़े और सारथी।तीनों रथ आकार-प्रकार और रंग-रूप में एक दूसरे से भिन्न होते हैं। कौनसा रथ किस विग्रह का है, कई कई चिह्नों द्वारा पहचाना जा सकता है, यथा- रथ का रंग, ध्वज, शिखर-चिह्न, पहियों की संख्या एवं अश्वों का रंग। रथ निर्माण के दौरान बिना रंगाई-पुताई के रथों को पहियों के आकार व संख्या से पहचाना जा सकता है। मैंने स्वयं भगवान के कृपापात्र गुणी भक्तों को ऐसा करते देखा है।भगवान जगन्नाथ का रथ रंग में लाल-पीला होता है। चार स्त्रीलिंग श्वेत अश्वों वाले इस रथ में पाँच हाथ परिधि के कुल सोलह पहिये होते हैं। शिखर पर चक्र और गरुड़ शोभते हैं, ध्वजा में गरुड़ चिह्न। दारुक (मातलि) द्वारा हाँके जाने वाले इस रथ का नाम नंदिघोष है।
भगवान बलदेव का रथ रंग में लाल-हरा होता है। इस रथ में चार हाथ परिधि वाले कुल चौदह पहिये लगाए जाते हैं। तालध्वज नामक इस रथ पर महाराज वैवस्वत मनु के पुत्र सुद्युम्न सारथी बनकर बैठे हैं। इस रथ में भी कृष्ण वर्ण के चार स्त्रीलिंग अश्वों को जोता जाता है।
देवी सुभद्रा का रथ लाल-काले रंग का होता है। इस रथ के अश्वों में विशेष संयोजन किया गया है। यहाँ पीले रंग के दो स्त्रीलिंग व दो पुल्लिंग अश्व जोड़े जाते हैं। इस रथ में चार हाथ परिधि वाले कुल बारह पहिये होते हैं। देवदलन नामक इस रथ के सारथी कुंतीपुत्र अर्जुन हैं।
तीनों के रथों में चहुंओर देवी-देवताओं के स्थान नियत किये जाते हैं। प्रत्येक रथ में एक ऋषिपाटा भी होता है, जहाँ आठ-आठ विभूतियों का स्थान सुरक्षित है।
प्रवास के चौथे दिन आता है, हेरा-पञ्चमी, जिसमें कि रथ-भंग की विचित्र बालसुलभ लीला! प्रसंग कुछ यों है कि प्रभु ने देवी लक्ष्मी से मात्र दो दिन के प्रवास की अनुमति ली है। किन्तु मौसी के यहाँ इतना आनन्द है कि प्रभु चौथे दिन भी श्रीमन्दिर नहीं लौटे। सो, दो दिन इस कड़ी प्रतीक्षा के पश्चात् हेरा-पञ्चमी को देवी लक्ष्मी सेवकों सहित श्रीजगन्नाथ मन्दिर से गुंडिचा भवन का प्रवास करती हैं।क्रोध के प्राकट्य स्वरूप, वे भगवान के सेवकों के लठमार होली जैसी कुछ लीला रचती हैं और लठों से रथ का कुछ भाग तोड़कर, बिना प्रभु से भेंट किए पुनः श्रीमन्दिर लौट आती हैं।




Recent Comments