अखण्ड बिहार के तीन शक्ति पीठों में सर्वेश्वरी हैं माँ अंबिका भवानी
चतुर्भुज व त्रिभुज परिधि में स्थित है सारण का सिद्धधाम,मानो यज्ञ मंडप का यज्ञ स्थल है आदमी
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✍परमार अखिलेश 😞त्रिगुणात्मक शक्ति उपासना की पुण्य भूमि बिहार व त्रिशक्ति पीठों में मूर्धन्य सारण का सिद्ध धाम आमी! सर्वेश्वरी अम्बिका भवानी मंदिर के समान दूरी पर चतुष्कोण में पूरब हरिहरनाथ सोनपुर, पश्चिम में धर्मनाथ,छपरा उत्तर में शिलानाथ,शिल्हौरी मढौरा वर्तमान दक्षिण में बिहटेश्वर महादेव बिहटा , पटना मानो यज्ञ मंडप हैं और त्रिभुज यज्ञ स्थल रूप में समान दूरी पर पूरब में रावणेश्वर महादेव बैजनाथधाम,झारखंड पश्चिम में विश्वेश्वर महादेव काशी उप्र व उत्तर में पशुपतिनाथ,काठमांडू नेपाल हैं।
शिव स्वयं अनादि शक्ति सर्वेश्वरी की उपासना कर्ता रहे हो,शिव दूत बनकर सदाशिव व अनाशक्ति के समुच्य व विग्रह रूप का। बहरहाल,शरद हो वासंतिक या चैत्र नवरात्रि दक्षिण मार्गी शक्ति उपासक वैष्णव, वाममार्गी अवधूत कपालिक साधकों के अलावे पूर्वांचल यूपी नेपाल व झारखंड के भक्त व श्रद्धालु मन्नते माँगने सच्चे दरबार में दस्तक देते है और खाली झोली भर देती हैं माँ भवानी ।
शास्त्रीय प्रमाणः दक्ष प्रजापति क्षेत्र है आमी या सुरथ-समाधि की तपोभूमि?इस पर विद्वतजन मतैक्य नहीं हैं ।प्रयाग के’कल्याण मंदिर’द्वारा प्रकाशित’बिहार की शक्ति सधना’पुस्तक के द्वितीय खंड में हुए उल्लेखानुसार’बिहार में शक्ति उपासना अनादिकाल से होती आई है।इस पावन भूमि पर तीन मूर्धन्य शक्ति पीठ हैं अम्बिका स्थान (आमी, दिघवारा, सारण) सर्वमंगला (गया) व छिन्नमस्तिका (रजरप्पा, हजारीबाग, झारखंड)।
दक्षप्रजापति का यज्ञस्थल-विद्वानों का एक पक्ष आमी को दक्ष क्षेत्र व यज्ञस्थल को सती दहन स्वीकारा है।सारण गजेटियर व पूर्व पुरातत्व निदेशक डॉक्टर प्रकाश चरण प्रसाद इसे दक्ष क्षेत्र व शिव-शक्ति समन्वय स्थल मानते हैं ।विश्व की एक मात्र मिट्टी की प्रतिमा को प्रागैतिहासिक स्वीकारते हुए कहते हैं’इसके लिए प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य नहीं है।शिव शक्ति क्षेत्र स्वतः प्रमाणित है।यहाँ गंगा शिव रूप में लिंगाकार हैं पूर्व में गंगा नारायणी व सोन के संगम रहे आमी में लिंगाकार शिव वर्तमान अंडाकार शक्ति स्थापित हैं।नौ दुर्गा की नौ पिंडियों के एकादश रूद्र स्थल साधना और सिद्धि के लिए उपयुक्त ही नहीं निर्णय भूमि है।’ महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन,आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा,डॉक्टर राजेश्वरसिंह’राजेश’ राणा परमार अखिलेश प्रभृति भाषाविद् उक्त पावन स्थल को दक्ष क्षेत्र,शिव शक्ति समन्वय भूमि व सांस्कृतिक विकास का स्थल कुषाणकालीन स्वीकारते हैं । ‘
डिस्कवरी आॅफ इंडिया’ में पंडित नेहरू द्वारा’ कनखल,उत्तराखंड को दक्ष क्षेत्र करार दिए जाने का खंडन करते हुए परमार’का कहना है कि कनकखल आमी का संगम तट है कल कल व खल खल जल ध्वनि तरंगे गंगा के कल कल व नारायणी के खल खल से निःसृत होती है। कल का ‘ल’व खल का’ल’लोप हो कर कनखल शब्द बना है ,जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता । हरिद्वार में गंगा का कल कल निनाद होता है।
अतः कल कल स्थल दक्ष क्षेत्र कैसे हो सकता है? महाकपालेश्वर भगवान रूद्र के गले में एक सौ आठ नर कपालों का मुंडमाल दर्शाता है कि एक सौ आठ बार सती अवतार व सती दहन हुआ है। संभव है हरिद्वार में हुआ है तो किसी युग में सारण के आमी मे भी हुआ है।
सुरथ-समाधि की तपोभूमिः-जगदाचार्य स्वामी त्रिदंडी जी महाराज के मानस-मर्मज्ञ शिष्य शिव वचन सिंह शिवम गजेन्द्र मोक्षधाम सोनपुर के पीठाधीश्वर स्वामी लक्ष्मणाचार्य ,प्रोफेसर बिपिन प्रसाद आचार्य रत्नेश्वर दयाल आदि वैष्णव विद्वान अंबिका स्थान आमी को सुरथ-समाधि की तपोभूमि स्वीकारते है।
मार्कण्डेय पुराण में वर्णित चैत्रवंशीय क्षत्रिय नरेश सुरथ को कोल क्षत्रियों ने परास्त कर्ता दिया था,समाधि वैश्य परिवार व धन से परित्यक्त थे। दोनों मेषध महर्षि के गुरूमंत्र परमार’का मिट्टी की पिंडी स्थापित कर तपस्या की और मनोवांछित फल प्राप्त हुए।गंगा नारायणी व सोन के संगम तट पर स्थापित एक मात्र मिट्टी की प्रतिमा से प्रमाणित है,सुरथ-समाधि तपोभूमि आमी ही है।
अंबे अंबिके अंबालिके मंदिर में उत्कीर्ण हैं जो अनादि महालक्ष्मी का पर्याय है।उत्खनन से प्राप्त शंख व चक्की भी वैष्णवी शक्ति का द्दोतक है। सच तो यह है कि विद्वानों की भेदबुद्धि से परे साधक अभेद अघोर अभय भाव से साधना रत रहते हैं । सबकी इच्छाएँ पूरी करती है माँ ।





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