मारवाड़ी समुदाय में सौभाग्य सूचक पर्व गणगौर पूजन होलिका दहन के साथ शुरू

संजय कुमार सुमन 
संपादक,दैनिक खोज खबर 

मारवाड़ी समुदाय में सौभाग्य सूचक पर्व गणगौर पूजन होलिका दहन के साथ ही मधेपुरा समेत सम्पूर्ण बिहार  में बड़े श्रद्धा एवं आस्था के साथ शुभारंभ हो गया है। अठारह दिनों के बाद विधिवत पूजन करने के साथ अंतिम दिन चैत्र नवरात्र की पूजा अर्चना की सुबह गणगौर पूजन संपन्न हो जायेगा।

बताया जाता है कि माता गणगौर पार्वती का ही एक रूप है। इस पर्व में नवविवाहिता पति की लंबी आयु के लिए एवं कुवांरी कन्याएं सर्वगुण संपन्न पति के लिए यह पूजन करती हैं। होलिका दहन के दिन से ही शुरू होने वाला यह व्रत चैत्र नवरात्र की तृतिया तक चलती है। होलिका दहन के बाद उसकी ठंडी राख एवं गाय के गोबर के सोलह शिवलिंग और शिव पार्वती की पिंडी बनाकर अठारह दिनों तक दूध,फल तथा जल से पूजा की जाती है। शीतला माता की पूजन के साथ ही बड़ी गणगौर पूजा की जाती है। विवाहिताएं कुम्हार के यहां से मिट्टी ला कर माता गणगौर की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करती हैं।

बताया जाता है कि शिव पार्वती के गृहस्थ जीवन की परिकल्पना पर आधारित यह पर्व राजस्थानी समाज के लिए महापर्व माना जाता है। इस दौरान हर घर में दिन और रात में गीत गाने का सिलसिला चलता रहता है। राजस्थानी गीत ‘‘ गौर ए गणगौर माता खोल किवाड़ी,बाहर खड़ी तेरी पूजन वाली,चुनर लागो री,चुड़ी वाला चुड़ी लाया,पहने रोआं चुड़ियां ’’ आदि गीत रोज गाये जाते हैं। पूजा शर्मा बताती हैं कि अधिक से अधिक घरों की महिलाएं 18 दिनों तक एक साथ यह पर्व मनाती है। इससे आपसी मेल जोल बढ़ता है। गणगौर की पूजा अमर सुहाग एवं सौभग्य के लिए किया जाता है। पंडित मनोज शर्मा ने बताया कि बड़ी गणगौर के दिन एक मिट्टी के पात्र में मिट्टी तथा बालू रख कर उसमें गेहूंॅ एवं जौ का रौपण किया जाता है तथा चैत्र नवरात्र तृतिया तक नित्य इसकी पूजा की जाती है।

गणगौर की पौराणिक व्रत कथा

एक बार भगवान शंकर तथा पार्वतीजी नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं।  भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफी विलंब हो गया। किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वतीजी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार कर सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। तत्पश्चात उच्च कुल की स्त्रियाँ अनेक प्रकार के पकवान लेकर गौरीजी और शंकरजी की पूजा करने पहुँचीं। सोने-चाँदी से निर्मित उनकी थालियों में विभिन्न प्रकार के पदार्थ थे।

उन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वतीजी से कहा- ‘तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?’पार्वतीजी ने उत्तर दिया- ‘प्राणनाथ! आप इसकी चिंता मत कीजिए।.उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूँगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यवती हो जाएगी।’

जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वतीजी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दी। जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। तत्पश्चात भगवान शिव की आज्ञा से पार्वतीजी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू की शिव-मूर्ति बनाकर पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया।

उत्तर में पार्वतीजी ने झूठ ही कह दिया कि वहाँ मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे। उन्हीं से बातें करने में देर हो गई। परंतु महादेव तो महादेव ही थे। वे कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अतः उन्होंने पूछा- ‘पार्वती! तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज का भोग लगाया था और स्वयं कौन-सा प्रसाद खाया था?’

स्वामी! पार्वतीजी ने पुनः झूठ बोल दिया- ‘मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे खाकर मैं सीधी यहाँ चली आ रही हूँ।’ यह सुनकर शिवजी भी दूध-भात खाने की लालच में नदी-तट की ओर चल दिए। पार्वती दुविधा में  पड़ गईं। तब उन्होंने मौन भाव से भगवान भोले शंकर का ही ध्यान किया और प्रार्थना की – हे भगवन! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो आप इस समय मेरी लाज रखिए।यह प्रार्थना करती हुई पार्वतीजी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें दूर नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। उस महल के भीतर पहुँचकर वे देखती हैं कि वहाँ शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार उपस्थित हैं। उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव-भीना स्वागत किया। वे दो दिनों तक वहाँ रहे।  तीसरे दिन पार्वतीजी ने शिव से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार न हुए। वे अभी और रुकना चाहते थे। तब पार्वतीजी रूठकर अकेली ही चल दीं। ऐसी हालत में भगवान शिवजी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारदजी भी साथ-साथ चल दिए। चलते-चलते वे बहुत दूर निकल आए। उस समय भगवान सूर्य अपने धाम (पश्चिम) को पधार रहे थे। अचानक भगवान शंकर पार्वतीजी से बोले- ‘मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ।’  ‘ठीक है, मैं ले आती हूँ।’ – पार्वतीजी ने कहा और जाने को तत्पर हो गईं। परंतु भगवान ने उन्हें जाने की आज्ञा न दी और इस कार्य के लिए ब्रह्मपुत्र नारदजी को भेज दिया। परंतु वहाँ पहुँचने पर नारदजी को कोई महल नजर न आया। वहाँ तो दूर तक जंगल ही जंगल था, जिसमें हिंसक पशु विचर रहे थे। नारदजी वहाँ भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वे किसी गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? मगर सहसा ही बिजली चमकी और नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टँगी हुई दिखाई दी। नारदजी ने माला उतार ली और शिवजी के पास पहुँचकर वहाँ का हाल बताया।

शिवजी ने हँसकर कहा- ‘नारद! यह सब पार्वती की ही लीला है।’इस पर पार्वती बोलीं- ‘मैं किस योग्य हूँ।’तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा- ‘माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती समाज में आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम-स्मरण मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है?’ महामाये! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है।  आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आशीर्वाद रूप में कहता हूँ कि जो स्त्रियाँ इसी तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगलकामना करेंगी, उन्हें महादेवजी की कृपा से दीर्घायु वाले पति का संसर्ग मिलेगा।