
✍रांची, खेलगांव से नवीन सिंह परमार की रिपोर्ट
💢रांची ( 30 सितंबर ) अपने देश में आरक्षण जैसे अतिसंवेदनशील व गंभीर मुद्दे पर अक्सर राजनेता कुछ भी कहने से बचते रहते हैं। लेकिन रांची में आयोजित लोकमंथन : 2018 के समापन समारोह में शामिल होने आईं लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इस मसले पर खुलकर अपनी बात रखी। मंच से अपनी बात रखते हुए लोकसभाध्यक्ष ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण सिर्फ 10 वर्ष के लिए लागू करने की बात कही थी लेकिन यहां हर 10 वर्ष बाद उसे फिर से 10 वर्ष या 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया जा रहा है। केवल आरक्षण की अवधि बढाने से किसी का उद्धार नहीं होने वाला।
श्रीमती महाजन ने सवालिया लहजे में पूछा कि क्या केवल आरक्षण देने से देश का उत्थान हो सकेगा? आरक्षण का लाभ लेने वाले लोगों को आत्मचिंतन करना चाहिए कि खुद के विकास हो जाने के बाद उन्होंने समाज को क्या कुछ दिया ? हालांकि यह कहते हुए सुमित्रा महाजन ने यह भी साफ कहा कि वह आरक्षण की विरोधी नहीं है।
उन्होंने कहा, “जब हम सामाजिक समरसता की बात हम करते हैं, तब हमें आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। जिन्हें आरक्षण का लाभ मिला उन्हें भी और जिनको नहीं मिला उन्हें भी। आज हमारी सामाजिक स्थिति क्या है ? हो सकता है मुझे आरक्षण मिला। मैं उस समाज से आ रही हूं और मैं अगर जीवन में कुछ बन गई तो मुझे सोचना चाहिए मैंने अपने समाज को वापस किया दिया । मैंने समाज को साथ में लेकर कितना सहारा दिया है।यह सोचना बहुत जरूरी है और यह सामूहिक रूप से सोचना पड़ेगा। जब हम समाज और प्रजातंत्र की बात करते हैं तो सोचना पड़ेगा। क्या मेरा समाज पिछड़ तो नहीं गया। मैं तो आगे बढ़ गई, क्या उसका फायदा उन्हें मिला। क्या आरक्षण की यही कल्पना है ?
लोकसभाध्यक्ष ने आगे कहा, “मैं बोलने में डगमगाती नहीं हूं। क्योंकि मेरे विचार पक्के हैं। डॉ अंबेडकर ने भी कहा था वह दोहरा रही हूं। हमें आरक्षण केवल 10 साल के लिए चाहिए.” उनकी इस बात पर सभा में बैठे लोगों ने ताली बजाई तो सुमित्रा महाजन ने इस पर नाराजगी जताई।
लोकसभा अध्यक्ष ने आगे कहा, “डॉ. अंबेडकर की कल्पना थी आरक्षण के 10 साल बाद वंचित समाज का सामूहिक उत्थान हो जाएगा और उन्हें पुन: आरक्षण की जरूरत नहीं पड़ेगी । लेकिन ऐसा नही हुआ । आखिर क्यों नहीं हुआ, इस पर विचार कौन करेगा ?
उन्होंने कहा कि हमें आरक्षण लागू करने की पद्धति पर विचार करने की जरूरत है । यह काम केवल सरकार नहीं कर सकती है । इस काम को करने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा । समाज जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो, ताकि उसे ज्यादा दिनों तक किसी भी प्रकार की आरक्षण लेने की जरूरत नहीं पड़े। यह चिंता सरकार से ज्यादा समाज को करना होगा । उन्होंने एक सामूहिक भोजन का उदाहरण देते हुए लोकसभा कहा कि सामूहिक भोजन में सब को निमंत्रण देकर बुलाया जाए और जाति के आधार पर बैठाया जाएगा तो उस सामूहिक भोजन का कोई मतलब नहीं रह जाता है ।
{ इनपुट – परमार डाॅट काॅम: सीवान }




Recent Comments