🚩हल्दी घाटी की ज़र्द मिट्टी सूर्खरू है भोजपुरिया खून से☪ 
🔯अरावली के शेर महाराणा प्रताप के तोपखाना व हरावल दस्ता के सिपहसालार थे शाहजादा हाकिम खां शूर
☪शेरशाह सूरी  के खानदान के थे महाराणा के सेनापति
🦁मुगल मक्कार​ मरकज़े-हिंद को गद्दारी से ज़ेर करके,
बकब्जे में राजपूताने को चला ज़ेहाद के वास्ते।
हिंदुआ शम्श ताने शमशीर राणा बढ़ा एकलिंग के आशीर्वाद के वास्ते।
भोजपुरिया खून हाकिम खां का उबला खात्मा करने जलालुद्दीन अकबरी लस्कर को।
उधर गद्दापेश ज़मीर फरोख्त मानसिंह अमेरी था।
इधर प्रताप के हमसफ़र झाला बीड़ा राम हाकिम बिहारी था।
“परमार” फक्र करता है भोजपुरिया जां निसारी पर।
नमन खिराजे-अकिदत कौमपरस्त तेगा नेज़ा राजपूती मेवाड़ी को।
🏹महाराणा प्रताप जयंती ९मई पर विशेष🕉 राजपूती आन-बान शान व स्वाभिमान के साथ मातृभूमि भूमि पर बलिदान के जोश जज़्बा व जनून में अकड़ा मेवाड़! मर्छीनुमा मूंछें तानी थी। उदयपुर कुंभलगढ़ से लेकर संपूर्ण राजपूताना भीलवाड़ा बिजौलिया के रण बाघों के दहाड़ से अरावली पहाड़ियों के पत्थर भहरा रहे थे। मूंछों पर चुटकी की रगड़ से निकल रही चिंगारियां आंखों में दहकते हुए अंगारे मुगलों के लाखों सैनिकों को खाक में मिलाने को बेताब । भगवान एकलिंग काम दीवान महाराणा प्रताप सिंह को परवाह नहीं था। भाई शक्ति सिंह, जगमालसिंह, चाचा सगरसिंह मुगलों के ताबेदारी में है। चचेरे भाई न महिपति अब महाबत खां बन गये। टोडरमल, बीरबल भगवान दास जैसे सत्ता सुख भोगियों के प्रलोभन से निस्पृह कर्म योगी प्रताप को सिर झुकाने व सिर कटाने के विकल्प में शीश कटाने काम संकल्प था। कुल कलंकी कुंवर मानसिंह के युद्ध का निमंत्रण देकर अकबर के हुक्म का तलबगार था। इधर  भील सरदार पूंजा राणा; मानसिंह झाला, मानसिंह वीड़ा,राजा रामशाह तोमर, कृष्ण दास चुंडावत, चंद्र सेन राठौर, आचार्य राघवेंद्र के आगे पठान हाकिम खां शूर अपने तोपखाना बंदुकचियों के साथ अड़ा था। मुगल फौज कुंवर मानसिंह व राजा भगवान दास, राजा जगरनाथ, आशफ खां, स्वालेद अहमद, बहलोल खां, मुल्तान खां , खेमकरन , भोपालसिंह के साथ मोर्चा बंद थे। १८जुलाई १५७६को हल्दी घाटी के दर्रे से भीलवीरों के वाणों की बौछार हाकिम खां के पठान बहादुरों के तोपों-बंदुको की तर्रतर्राहट हर हर महादेव जय एकलिंग के  नारे के साथ रणबाघ टूट पड़े।
            २२हजार राष्ट्रवादी राजपूत पठान व भील सेनानियों की तलवारें​ तीरें बन्दुकें तोपों मार के आगे मुगल टिड्डी दल पिद्दी साबित होने लगा। सैफुद्दीन खां महाराणा के तलवार से एक ही वार में बीचों-बीच दो भागों में विभक्त हो जहन्नुम को रवाना हुआ। चेतक टाप सिपहसालारे-आज़म मान सिंह का हाथी कांप उठा सूंड गवां चुका हाथी मान सिंह को बचा कर भाग निकला। शाहजदा  सलीम प्रताप का एक भी प्रहार झेल नहीं सका। जान लेकर भागा। मुगल सैनिक राणा को घेरे में ले चुके थे और वार कर रहे थे। मेवाड़ भक्त मान झाला ने भाले की नोक से महाराणा के​ क्षत्र को अपने शीश पर धारण कर अपना बलिदान देकर हिंदुआ सूर्य को सुरक्षित कर रणांगन से निकल जाने की प्रार्थना की। घायल चेतक आपने घायल स्वामी को लेकर पवनवेग से सरपट दौड़ा। पीछा कर रहे दो मुगल सिपाहियों को बागी शक्ति सिंह इधर ढेर कर आगे बढ़े उधर नाला पार करते ही चेतक धाराशाई हो कर वीरगति प्राप्त की।बागी शक्ति सिंह अब मेवाड़ भक्त हो राणा के शरणागत थे। क्षमा याचना के बाद अपना अश्व देकर महाराणा को विदा कर शिविर की ओर बढे।उधर गोवा बारूद समाप्ति के बाद तलवार से मुगलों को दोजख रसीद करते हुए सेनापति हाकिम खां शूर वीर गति को प्राप्त हुए। २२हजार राजपूत वीरों में २१हजार वीर गति को प्राप्त हुए।मुगल सैनिक १लाख बीस हजार मारे गए। युद्ध खां परिणाम अनिर्णित रहा। निरंतर संघर्ष व भामाशाह के आर्थिक सहयोग से महाराणा ने १५८५में मेवाड़ में अपना सिक्का चला दी।
कौन थे महाराणा?:—– महाराणा जैसे शूर वीर को अपने अपने पूर्वज बताने की होड़ में दलित वर्ग आदिवासी भील कंजर बंजारे नट दारु भी शामिल हैं। मगर, सूर्य वंशी भगवान राम के वंशज रावलबप्पा को कैसे शामिल करें ?इसकी भी होड़ है। 
राणा सांगा के पौत्र व राणा उदय सिंह व महारानी जयवंता बाई के जेष्ठ पुत्र के रुप में प्रताप सिंह सिसोदिया खां अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ ,९मई १५४० में हुआ था। कुंभलगढ़ खां किला साक्षी है। गोंगुडा में ताजपोशी के बाद मेवाड़ को मुगलों से मुक्ति कार्ययोजना के तहत संघर्ष खां अंत १५८५मे हुआ।  हल्दी घाटी युद्ध पर राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय मेवाड़ के शोध प्रज्ञों ने राजस्व भूमि बंदोबस्त आदि में एक लिंग के दीवान महाराणा प्रताप सिंह के हस्ताक्षर मोहर के आधार व मानसिंह के मुगल दरबार में हाजिरी पर रोक से निष्कर्ष निकाला है कि राणा की विजय हुई थी। 
हाकिम खां शूर कौन थे:- सूरी सल्तनत के संस्थापक शेरशाह सूरी के वंशज व पठान  मुस्लिम हाकिम खां शूर अफगानिस्तान के  गौरी सल्तनत के हिंदू शासक अमीर सूरी के रक्त थे। ११११ई में महमूद गजनवी के आक्रमण से गौर साम्राज्य कायम पतन हो गया । तवारीख-ए-गुज़िदा, हिंदू मुस्ताफी;तवारीख-ए-युमनी के अनुसार महमूद गजनवी के जेहादियों ने बहुत सारे हिंदू बौद्धों को कत्ल करवा दिया और इस्लाम कबूल करवाया। वहीं से सूर वंश भारत आए बिहार के सासाराम में बस गए पस्तो जुबान व भोजपुरी उनकी अपनी बनी। १५६५में पानी पथ में मुगलों की जीत के बाद पठानों ने राजपूतों खां साथ दिया, क्यों कि चंगेज तैमूर लंग भी महमूद गजनवी के राह के राही थे। लिहाजा, खैसा खां सूरी के पुत्र हाकिम खां शूर जैसा योद्धा मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह के तोपखाना प्रमुख बन हल्दी घाटी में लड़ते हुए २१जून १५७६को वीर गति प्राप्त की सच तो यह है कि हल्दी घाटी संग्राम राष्ट्रवादी बनाम साम्राज्यवादी​ विस्तार वाली संग्राम था। हां ज़ेहाद का नारा आसफ खां ने हल्दी घाटी में दिया था। चितौड़ युद्ध में अकबर ने दिया था। १५२७के खानवां के युद्ध में बाबर ने दिया था। इसका लाभ मुगलों को मिला कुछ पठान अकबर के पक्षधर​ बन गये, मगर, हाकिम खां शूर और उनके ५०००साथी पठानों ने राष्ट्रवादी राजपूतों के नेता महाराणा प्रताप सिंह कांग्रेस साथ देकर अमर हो गए। राणा की समाधि , भामाशाह की छतरी व हाकिम खां शूर के तुरबत पर दीपक जलाने वाले हिंदू मुस्लिम राष्ट्र वाद की प्रेरणा ग्रहण करते हैं।