*सीवान : पंचायत सचिव की आपत्ति के बाद भी हुआ अवैध ढंग से नियोजित शिक्षिका का मानदेय भुगतान*
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✍ दैनिक खोज खबर के कुमार विपेंद्र की रेपोर्ट
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पचरुखी (सीवान) :नीतीश सरकार भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हो,मगर भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।एक तरफ जहां उच्च शैक्षणिक योग्यता धारी रोजगार की तलाश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं वहीं दूसरी ओर अयोग्य लोग सरकारी नौकरी पा रहे हैं।मजे की बात तो यह है कि मामला शिक्षा विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में होते हुवे भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
अपनी विशेष कार्यशैली को लेकर हमेशा चर्चा में रहने वाला शिक्षा विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है।एक तरफ लोग शिक्षक नियोजन इकाई को लेकर तरह -तरह की बातें कर रहे हैं।वहीं दूसरी और पूरे विभाग को भी कठघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आ रहे हैं।ताजा मामला जसौली पंचायत के नया प्राथमिक विद्यालय बलुआ टोला में कार्यरत एक शिक्षिका के नियोजन से जुड़ा हुआ है।उक्त शिक्षिका ने बिना अर्हता के न केवल बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक नियोजन नियमावली 2012 को धता बताते हुए नियोजन प्राप्त कर लिया बल्कि अब भुगतान का भी दावा कर रही है।जबकि भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशित तथ्यों के मुताबिक उक्त शिक्षिका के पास शिक्षक बनने के लिए न्यूनतम आवश्यक योग्यता की कौन कहे शिक्षक पात्रता परीक्षा में बैठने के लिए भी अयोग्य है।
*👉क्या कहती है नियमावली…*
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के प्रावधानों एवं बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक नियमावली 2012 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को वर्ग एक से पांच तक (बेसिक ग्रेड) शिक्षक बनने के लिए उच्चतर माध्यमिक (इंटरमिडिएट) में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक होने जरूरी हैं।तभी वह शिक्षक पात्रता परीक्षा में बैठने की योग्यता रखता है।परंतु उक्त शिक्षिका ने इंटर में मात्र 369/900 अर्थात् 41% अंक ही प्राप्त किए हैं।अब यहां यह प्रश्न उठता है कि उक्त शिक्षिका जब न्यूनतम योग्यता ही नहीं रखती तो शिक्षक पात्रता परीक्षा में कैसे बैठ गयी ?और तो और इसने शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास कर ली जबकि वह परीक्षा में बैठ ही नहीं सकती थी।जानकार सूत्रों का यह कहना है कि परीक्षा में हो न हो कोई स्कॉलर ही बैठा हो।क्योंकि ऐसा बहुत हो रहा है।
*👉नियोजन इकाई ने क्यों नहीं किया शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जाँच…?*
आम लोग नियोजन इकाई पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं।यह यक्ष प्रश्न है कि आखिर नियोजन इकाई ने नियोजन देते वक्त क्यों नहीं कागजात देखे?क्या मामला एलडी यानि लेन-देन का था?अथवा कुछ और….?
लोग कहते हैं कि जब सरकार मैट्रिक पास पंचायत सचिव को शिक्षक बनाने की जिम्मेवारी सौंपेगी तो इसका हश्र ये होना ही है।जिस शिक्षिका को काउंसलिंग के समय ही बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए उसको नियोजित किया गया ।पंचायत सचिव ने पहले तो उसका नियमावली के विरुद्ध नियोजन कर लिया ।फिर जब गर्दन फंसने की आयी तो जिला शिक्षा पदाधिकारी और जिला कार्यक्रम पदाधिकारी से मार्गदर्शन भी मांग लिया।विभाग के तथाकथित पदाधिकारियों की मंशा तो देखिए मार्गदर्शन तो दूर वे उल्टे उक्त शिक्षिका के वेतन भुगतान तथा हाईकोर्ट जाकर इनके नियोजन को वैध बनाने का रास्ता सुझा रहे हैं।
वहीं इस संबंध में अंदरखाने यह चर्चा चल रही है कि जिले में ऐसे अनेक मामले हैं ।जो कि विभागीय पदाधिकिरियों की न केवल जानकारी में है ।बल्कि कईओं से तो स्पष्टीकरण की मांग भी की गयी है और वेतन भुगतान भी कर रहे हैं।एक शिक्षक ने इस संबंध में नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि यह सारा कुछ सुनियोजित तरीके से विभागीय मिलीभगत से शिक्षा माफियाओं द्वारा संचालित किया जाता है।जहां पर प्रथम दृष्टया ही नियोजन अवैध है।वहां पर नियोजन इकाई के मत्थे मढ़ कर अपना दामन बचाया जाता है।जबकि विभाग को इस संबंध में हाईकोर्ट जाने का भी निर्देश देना चाहिए।दरअसल जहां से उगाही हो जाती है वहां विभागीय अधिकारी-कर्मचारी चुप हो जाते हैं तथा जहां पर विरोध होता है वहां कोर्ट जाते हैं।




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