
“सत्संग क्यों आवश्यक है ?”
“नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च ।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ।।” (पद्मपुराण उ. 14.23)
(भगवान विष्णु जी कहते हैं- हे नारद ! मैं न तो बैकुंठ में ही रहता हूँ और न योगियों के हृदय में ही। मैं तो वहीं रहता हूँ, जहाँ प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नाम का कीर्तन किया करते हैं। मैं सर्वदा ऐसे लोगों के अन्तःकरण में ही विद्यमान रहता हूँ।)
हमारे धर्म-ग्रंथों, संत-महात्माओं और स्वयं भगवान ने सत्संग की महिमा का गान किया है। सत्संग अर्थात (सत्) सत्य का संग। इसलिए सत्य का संग करना ही सत्संग है। स्वयं भगवान ही परम सत्य हैं। वे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान एवं सर्वश्रेष्ठ हैं। वे ही रचनाकार, पालनकर्ता व संहारकर्ता हैं। इसलिए उस परम पिता परमेश्वर के गुणों और उनके बताये मार्ग पर चलने की चर्चा ही सत्संग है। इसमें विद्वान, ज्ञानी व श्रद्धावान व्यक्तियों द्वारा की गयी भगवत् चर्चा में शामिल होना होता है। प्रामाणिक शास्त्रों का अध्ययन एवं ईश्वरीय मनन-चिंतन भी सत्संग की श्रेणी मे आता है। सत्संग से अच्छे विचार निकलकर आते हैं। यह हमें अच्छे बुरे की पहचान बताता है। सत्संग संत बनाता है। सत्संग राम बनने की प्रेरणा देता है।
सत्संग के बारे में अनेक संत-महात्माओं ने लिखा है :
तुलसीदास जी कहते हैं:
“बिनु सत्संग विवेक न होई ।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।।”
(अर्थात बिना सत्संग के विवेक नही होता। विवेक का अर्थ है अच्छे बुरे की पहचान और राम कृपा के बिना वो सत्संग नसीब नही होता है।)
“तात स्वर्ग अपबर्ग सुख, धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सतसंग॥”
(अर्थात हे तात् ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से प्राप्त होता है।)
“बिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद, होइ न दृढ़ अनुराग।।”
(अर्थात सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गये बिना श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में दृढ प्रेम नहीं हो सकता। )
कबीरदास जी कहते हैं –
“राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।
जो सुख साधु सगं में, सो बैकुंठ न होय ॥”
(अर्थात जिस समय कबीर जी का अंत समय आया तो कबीरदास जी रोने लगे। भगवान बोले-कबीर, तुम सारा जीवन नहीं रोये लेकिन आज जाने का समय आया है तो रो रहे हो ? क्या जाने का मन नही है ? या मरने से डर लगता है ? कबीरदास जी कहते हैं- नहीं नहीं प्रभु, ऐसी बात नहीं है, जाना तो पड़ेगा क्योंकि आपका आदेश है लेकिन जो सत्संग रूपी सुख इस धरा पर है वो आपके धाम में नही मिलेगा।)
सत्संग से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं जिन्हें चार भागों में बांटा जा सकता है :
- तृष्णाविहीन वृति
- अन्तःकरण शुद्धि
- अनन्य भक्ति
- भक्तों से प्रीति
- तृष्णाविहीन वृति – जब सत्संग कहने और सुनने में ईमानदारी रखी जाय तो फिर तृष्णाविहीन वृति हो जाती है।
- अन्तःकरण शुद्धि – जैसे घर को साफ रखने के लिए बार-बार झाड़ू लगाते हैं, वैसे ही, अंत:करण को शुद्ध रखने के लिए सत्संग रूपी झाड़ू लगाते रहना चाहिए।
- अनन्य भक्ति – जब हम बार बार कथा सुनते हैं तो ईश्वर के चरणों में हमारी स्वतः ही भक्ति जाग्रत हो जाती है।
- भक्तों से प्रीति – भगवान से प्रीति होते ही उनके भक्तों से प्रेम हो जाता है।
आदि शंकराचार्य ने कहा है-
“सत्संगत्वे निस्संगत्वं निस्संगत्वे निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं निश्चलतत्वे जीवन्मुक्ति:।।
(अर्थात सत्संग से अनाशक्ति पैदा होती है और अनाशक्ति से अमोह ! अमोह से चित्त निश्चल होता है और निश्चल चित्त से जीवन मुक्ति उपलब्ध होती है।)
बिना ईश्वर के स्थायी सुख (मोक्ष) नहीं। बिना ज्ञान व सत्कर्म के ईश्वर की कृपा नहीं और बिना सत्संग के ज्ञान नहीं। सत्संग विवेकानन्द और शंकराचार्य बनाने के मार्ग पर ले चलता है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, असत्य से सत्य की ओर और पाप से पुण्य की ओर ले जाने का मार्ग है। यह मानव को महामानव बनाने का मार्ग है। यह मुक्ति का मार्ग है।
तो आइये, सत्संग करें और जीवन को सफल बनायें।
(लेखक श्री जय प्रकाश सिंह मूलतः सारण जिला के निवासी हैं और शिमला में आईजी पुलिस के रूप में तैनात है)




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