पटना(अनूप नारायण सिंह के फेसबुक वॉल से) : उपेक्षा किस कदर किसी प्रतिभा का अंत कर देती है या वशिष्ठ नारायण सिंह से बेहतर भला कौन समझ पाया होगा। वर्षों से हमने उनकी कोई सुध नहीं ली अब हम हर साल 14 नवंबर को वशिष्ठ नारायण सिंह को याद करेंगे। वो कई दशकों से बीमार थे। स्मृति लोप या सिजोफ्रेनिया ने उनकी इस प्रतिभा को लगभग निरर्थक बना दिया था ।जिसके झंडे उन्होंने कभी पूरी दुनिया में गाडे थे और जिस वजह से हम आज उन्हें याद कर रहे हैं ।नारायण सिंह का पूरा मामला बताता है कि एक समाज और एक देश के तौर पर अपनी प्रतिभाओं और महान सपूतों के साथ हम किस तरह का बर्ताव करते हैं, खासकर जब वे निजी स्तर पर किसीसंकट में होते हैं।बिहार के एक छोटे से पिछड़े और सुविधाहीन गांव से निकलकर कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी तक गणित की अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़ने वाले इस गणितज्ञ की कहानी हमे एक अन्य महान भारतीय गणितज्ञ रामानुजन की याद दिला देती है।स्थानीय स्तर पर रामानुजन की प्रतिभा को कुछ भले ही जानते -समझते थे,लेकिन सच यही रहा कि वह भारत मे एक क्लर्क की साधारण सी जिंदगी जीने पर मजबूर थे।यही वशिष्ठ नारायण जी के साथ हुआ,उनकी प्रतिभा को हमने ठीक तरह से तभी समझा, जब उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से न सिर्फ पीएचडी की डिग्री हासिल की बल्कि उन्हें वहां एसोसिएट प्रोफेसर भी बना दिया गया।ढलती उम्र और लंबे समय तक पर्याप्त चिकित्सा सुविधा और देख रेख न मिलने से वह जीवन की संध्या वेला की ओर बढ़ चले थे।यह सब पहले हुवा होता तो शायद दुनिया को उस वैज्ञानिक की प्रतिभा का कुछ और लाभ मिल पाता,जिसने एक समय आइस्टीन के सापेक्षता-सिद्धांत तक को चुनौती दे डाली थी।नमन है ऐसे महान सपूत को।हमारे पास या तो उनकी अब यादें हैं या बहुत सारा पछतावा।

विनम्र श्रद्धांजली