नागरिक पत्रकारों से परम्परागत पत्रकारों को मिल रही है जबरदस्त चुनौती

✍नवीन सिंह परमार
🔴डिजिटल युग में तकनीक की ताकत की वजह से मुख्यधारा के मीडिया से ज्यादा तेज और ताकतवर साबित हो रहें है नागरिक पत्रकार । कई बार किसी बड़ी घटना या दुर्घटना की पहली तस्वीर, ऑडिया या वीडिया नागरिक पत्रकारों के माध्यम से सबसे पहले सोशल मीडिया पर नजर आ जा रहे है ।
मोबाइल फोन और डिजिटल कैमरे ने आम लोगों (गैर-पत्रकारों) के हाथों में पत्रकारिता के औजार पहुंचा दिए हें। इंटरनेट ने संवाद का मंच उपलब्ध करा दिया है। अब पत्रकारिता परंपरागत पत्रकारों की मोहताज नहीं है। तकनीकी तौर पर देखें तो आज भारत में कोई व्यक्ति फेसबुक पर अपनी बात ढाई करोड़ से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में सक्षम है।यह संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा सर्कूलेशन वाले अंग्रेजी दैनिक होने का दावा करने वाले अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रीडरशिप से ज्यादा है। इंटरनेट पर कोई खबर टेक्स्ट, ग्राफिक्स, ऑडियो या वीडियो किसी भी या इन सभी फॉर्मेट में हो सकती है।
हाइपरलिंक की सुविधा के कारण संदर्भ देना भी आसान होता है और इसमें शब्द या समय की सीमा नहीं होती।
डिजिटल मीडिया व नागरिक पत्रकारों की बढ़ती भूमिका को देखते हुए सरकार व देश के जिम्मेवार मीडिया हाउसों एवं मीडिया से जुड़े संगठनों को चाहिए कि इन पत्रकारों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करें ।
कई बार देखा जा रहा है कि कई वरिष्ठ पत्रकार इन नागरिक पत्रकारों की न केवल अनदेखी करते है बल्कि यह भी कहते सुने गए है कि ये कितने दिन टिके गें । शायद ऐसा सोचने-विचारने वाले हमारे वरिष्ठ पत्रकारों पता नहीं है कि पुरी दुनिया की पत्रकारिता आज बदलाव के दौर से गुजर रही है । हर देश की मीडिया नागरिक पत्रकारिता के महत्व को केवल समझने ही नहीं लगी है बल्कि वे लोग अपने समाचार पत्रों व न्यूज चैनल्स के लिए इनका उपयोग भी शुरू कर दिए है ।
मीडिया में नागरिक पत्रकारों के बढ़ते प्रभाव का ही परिणाम है कि आज सबसे ज्यादा प्रसार के दंभ भड़ने वाले समाचार पत्र हो या फिर दुनिया में सबसे ज्यादा सुने जाने वाला रेडियो बी बी सी हो । इन लोगों को मार्केट में टिके रहने के लिए अपना वेबपोर्टल लेकर आना पड़ा है ।
कुल मिलाकर एक बात स्पष्ट हो चुका है कि आज अगर मीडिया में टिके रहना है तो नागरिक पत्रकारों व उनके द्वारा सोशल मीडिया पर संचालित न्यूज सर्विसों से केवल मुकाबला ही नही करना होगा बल्कि कहीं न कहीं उनके साथ समझौता भी करना पड़ेगा ।
( इनपुट : परमार डाॅट काॅम-सीवान )