छपरा में हल्का-ए-अदब के तत्वावधान में आयोजित की गयीं कवि गोष्ठी
छपरा. सामाजिक और नैतिक मूल्यों में साहित्य का योगदान रेत में सोने के समान है. सारण की साहित्यिक भूमि इन मूल्यों से चिरपरीचित है और उसे आगे बढ़ाने में हमेशा तत्पर रहती है. उक्त उदगार इलाहाबाद से आए प्रसिद्ध शायर अशरफ खयाल ने हल्का-ए-अदब के तत्वावधान में आयोजित कवि गोष्ठी में कहीं. उनके आगमन पर आयोजित गोष्ठी में जयप्रकाश विश्विद्यालय के उर्दू विभाग के प्राध्यापक डॉ मजहर कीबरिया ने पाठ किया
‘पुकारू किस तरह पानी में अपनी कश्ती ए जां को, ये साहिल किस गजब का है यहां दरिया नहीं होता’
प्रो शमीम परवेज ने गजल पढ़ी
‘झुक कर मांगते हैं अदब से मांगते हैं, हम जो भी मांगते हैं रब से मांगते हैं.’
बालीवुड के नगमा निगार डॉ मोअज्जम अज्म ने लोगों को आह और वाह कहने पर मजबूर कर दिया ‘इक तेरा गम घर ले आए, कितने मौसम घर ले आए’
शहजाद आलम ने खूब वाह वाही बटोरी – ‘कब्रिस्तानों की खामोशी छाई है इन जहनों पर, थोड़ी हलचल मच जाती है लाश कोई आ जाए तो’
मौलाना यार मोहम्मद सलफी ने माहौल में जोश भरा – ‘कश्तीयां तोड़ दो बस्तियां छोड़ दो, ऐ जवानों हवाओं का रुख मोड़ दो’
प्रो शकील अनवर ने रूमानियत की बात छेडी – ‘ख्वाब पलकों पर अगर तुमने सजाया होता, तेरी नींदों में सनम मैं ही मैं आया होता.’ मौके पर कृष्ण मेनन, तैयब हुसैन आदि उपस्थित थे.