कांग्रेस की संप्रभुता की सोंच या साम्यवादी साम्राज्यवादी पैरोकारिता

छपरा/अखिलेश परमार।
यद्यपि चीन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तहत डाॅ सनयात सेन ने चीनी जनता को जागृत की ,गृह युद्ध के बाद अंतिम राजा च्ये का अंत और प्रधानमंत्री च्वांग काई सेक ने फारमोसा द्वीप समूह में ताइवान गणराज्य के तहत सरकार स्थापना को मित्र राष्ट्रों ने मान ली। संयुक्त राष्ट्र संघ में ताइवान के स्थान पर भारत को स्थायी सदस्यता की पुरजोर वकालत अमरीका और सोवियत संघ ने की किंतु नेहरू का चीन प्रेम ही चीन को ‘वीटो पावर’ का हकदार बना दिया ।


विजयालक्ष्मी पंडित, कृषणमेनन व पाणिकर का साम्यवादी प्रभाव अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के बहन विजयालक्ष्मी पंडित पहले सोवियत संघ की राजदूत बनी, जहाँ स्टालिन को प्रभावित नहीं कर सकी ।फिर 1950 मे संयुक्त राज्य अमरीका का राजदूत बनी। स॔युक्त राज्य अमरीका विदेश मंत्रालय ने ताइवान की जगह भारत को यूएनओ में स्थायी सदस्यता दिलाने की वकालत की । इस आशय का पत्र राजदूत विजयालक्ष्मी पंडित ने नेहरू को भेजा और समाचार एजेंसी ‘ रायटर ‘ को दिए गए साक्षात्कार में भारत को स्थायी सदस्यता की अनिच्छा जाहिर की। फिर सोवियत संघ के प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन ने 1955 में नेहरू का मन टटोला ही नहीं संयुक्तराष्ट्र संघ में छठा सीट भारत के लिए सृजन की बातें कहीं किंतु नेहरू ने खारिज कर दिया । उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि चीन एक महान देश है, उसे उचित स्थान दिलाना भारत का नैतिक कर्तव्य है,हमें भूखा रहकर भी चीन को अधिकार दिलाना चाहिए और चीन संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सदस्यता प्राप्ति में में सफल रहा।
सनद रहे कि साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित केएम पणिक्कर राजदूत बनकर चीन गए और तानाशाह माओत्सेतुंग से मिले। अपने रिपोर्ट में पणिक्कर ने लिखा ‘ मिस्टर चेयर मैन का चेहरा बहुत ही कृपालू है ,आंखों में उदारता टपकती है। संघर्ष से उभरे छोटी आंखें स्वप्निल हैं,भारत के प्रति गहरे अर्थो में मानवतावादी हैं । 1952 में विजयालक्ष्मी पंडित एक शिष्ट मंडल सहित पेइचिंग गयीं और अपनी रिपोर्ट में लिखा ‘ मिस्टर चेयर मैन का हास्य बोध कमाल का है और उनकी लोकप्रियता महात्मा गाँधी की याद दिलाती है। बस क्या था? पंडित नेहरू ने 1954 में ही तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग की स्वीकृति दे दी। आश्चर्य तो तब होता है कि हजारों चीनी नागरिकों का हत्यारा माओत्सेतुंग जो कहता था ‘ द पावर कम,फ्राॅम द बैरल ऑफ गन’ को कैसे नेहरू ने मानवतावादी स्वीकार कर यूएनओ के स्थायी सदस्यता दिला दी। इतना ही नहीं तिब्बत से सटे भूभाग में सड़क निर्माण कार्य जारी रखा। 1959 में तिब्बत पर अधिकार के बाद दलाईलामा को भारत मे शरण के बाद भी चीन तैयारी करता रहा। रामचंद्र गुहा के ‘ आधुनिक भारत का इतिहास’ बताता है कि रक्षा मंत्री वीके कृष्ममेनन नेहरू के प्रिय थे जो मार्क्स व चार्ल्स डिकेन के भक्त थे । 1956 में अक्साई चिन में सड़क निर्माण कार्य जारी है और नेहरूजी उदासीन रहे फिर अक्साई चिन को अपना भू-भाग दर्शाते हुए नक्शा जारी किया, फिर भी उदासीनता रही नेहरू- सरकार 1960 में चीनी प्रधानमंत्री भारत आया ‘ हिंदी चीनी भाई भाई के साथ दिल्ली में गर्मजोशी से स्वागत हुए जबकि राष्ट्रवादियों ने विरोध किया । 1961 में चीन की ‘फारवर्ड पाॅलिसी’ से भी सरकार बेखबर रही और फिर 1962 में आक्रामक 40,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय भू भाग पर कब्जा ने हिंदी चीनी भाई भाई व पंचशील को पंचर कर दी न सोवियत संघ ने और न अमरीका ने साथ दी। शास्त्री जी पाकिस्तान जीत कर भी तासकंद में जिंदगी से भी हार गए । फिर इंदिरा गाँधी ने बांग्लादेश में जीतकर भी शिमला में हार गई । गैर कांग्रेसनीत सरकारों अल्पकालीन रहीं और कांग्रेसी नीति पर चलती रहीं । अटल जी ने सीमा विवाद सुलझाने का प्रयास किया । किंतु संप्रग सरकार ने तो चंदा के एवज में संप्रभुता को गिरवी रख दी। डोकलाम के बाद लद्दाख अब युद्ध के कागार पर है। देखना तो यह है कि गत् 15 जून 2020 को हुए खूनी संघर्ष के बाद चीन का अगला रूख क्या होता है। वैसे कैरोना महामारी का वाहक चीन के विरूद्ध एशिया और यूरोपीय देशों में आक्रोश है। चीन सागर व प्रशांत महासागर में युद्ध पोत तथा भारतीय सीमा पर आर्मी आकाश में वायु सेना नज़र जमाए हुए है,इसबार ‘आर पार’ की संभावना अधिक है। गद्दारी व मक्कारी की सजा तिब्बत ,ताइवान, हांगकांग की आजादी ही हो सकती है।