
पंडित नेहरू को साफा बांधते संतराज सिंह रागेश
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अब तो रागेश जी की राग रागिनियां व्योम में ही व्याप्त है.
🎤नहीं सुनाई पड़ते आकाशवाणी से स्वर सम्राट के आलाप.
🚩परमार अखिलेश राणा🇦🇱
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दैनिक खोज खबर ब्यूरो ,सारण
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📡२५अप्रैल की कालरात्रि कहर बनकर टूट पड़ी भोजपुरी लोकगीत संगीत संसार पर लोक संगीत के चमक दार नक्षत्र महाशून्य में विलीन हो गया। अब तो व्योम से स्वर सम्राट संतराज सिंह रागेश की स्वारालाप सुनाई पडेगे।बहरहाल, उनकी विरासत को रागेश कला एवं संस्कृति संस्थान व उनके छोटे पुत्र दिलीप कुमार सिंह बचाने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं।
पैतृक विरासत में प्राप्त थी संगीत:-२अक्टूबर १९३३को रामपुर आमी के संपन्न कृषक ठाकुर बुधराम सिंह के इकलौते पुत्र संतराज सिंह को सांगीतिक संस्कार पिता से ही मिलती थी। बाल संतराज सिंह के पिता बाबू साहब बुधराम सिंह रामायण मंडली के व्यास थे। बहरहाल, शैशवास्था में संगीत कार्यक्रम सारस्वत बीजारोपण हुआ। फिर ग्रामीण सखा और संतराज सिंह से बड़े जन्मजात कवि व गीतकार अर्जुन सिंह अशांत ने उनकी प्रतिभा को तराशा। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद दोनों का दाखिला राजेंद्र कालेज छपरा में हुआ, जहां प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिंहा , जनार्दन झा द्विज जैसे साधकों का सारस्वत सान्निध्य प्राप्त हुए। अपने शिष्य की प्रतिभा से प्रभावित प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिंहा ने तत्कालीन बिहार के शिक्षा सचिव जगदीश चंद माथुर को संस्तुति पर दी और अशांत जी व रागेश जी शिक्षा विभाग के मोदमंडली में शामिल कर लिए गए । फिर तीसरे सदस्य के रूप में सुरेश सिंह भी शामिल हो गए। अशांत जी बाद में पुलिस विभाग की सेवा में चले गए और संतराज सिंह राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय तुर्की मुजफ्फरपुर में अनुदेशक बन गये।
सांगीतिक यात्रा व सम्मान:–१९५३में महाविद्यालय में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में डीपीआई ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान की। १९५४में असम के टीटीवर में आयोजित अखिल भारतीय बुनियादी शिक्षा सम्मेलन में संतराज सिंह ने बिहार का प्रतिनिधित्व किया और प्रतिभा काम लोहा मनवा दिया। १९५६में महाविद्यालय तुर्की के वार्षिकोत्सव में डीपीआई लखवी साहब ने नकद पुरस्कार से सम्मानित किया।१९५८में बिहार सरकार द्वारा राष्ट्रपति भवन भेजें गये।महामहिम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सम्मानित किया और रागेश उपनाम प्रदान की।तब से लेकर जीवन पर्यंत तक गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली जाने का क्रम चलता रहा। नेहरू जी शास्त्री जी इंदिरा जी मोरारजी देसाई ने सम्मानित किया।
आकाशवाणी के’ए’ग्रेड कलाकार रागेश जी १९७०में अखिल भारतीय कोरस संगीत प्रतियोगिता में सर्व प्रथम रहे।१९८०में अंजुमन-शेरे-ग़ुल-फरोसा दिल्ली महरौली प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया।१९८४में भिखारी ठाकुर सम्मान,१९८७मे राजस्थान में सर्वप्रथम पुरस्कार तथा बिहार यंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने’बिहार श्री’से सम्मानित किया। १९९१में सेवा अवकाश के बाद करीब १९९५तक बिहार काली प्रतिनिधित्व करते रहे।१९९९में भारत खंडे सम्मान व २००५में भारत विकास परिषद सारण इकाई ने ‘-सारण-सपूत’से अलंकृत किया।२००५में सांसद प्रभुनाथ सिंह ने पद्म पुरस्कार हेतु रागेश जी व सुरेश सिंह की संस्तुति की थी। मगर————??????




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