CAA और NRC पर समर्थन और विरोध के लिए जनता स्वतंत्र है,मगर हिंसा व आगजनी अथवा हिंसात्मक विरोध संविधान की मूल भावना के खिलाफ है : मनोज कुमार सिंह

【सारण के पत्रकार मनोज कुमार सिंह की कलम से)】

छपरा : केन्द्र सरकार द्वारा कैब और एनआरसी लागू किये जाने को लेकर समर्थन और विरोध प्रदर्शन का दौर चल रहा है। देश की जनता के मनोमस्तिष्क में चल रहे द्वंद और संशय से हम भी अछूते नही हैं। हम सब देश के नागरिक हैं। लोकतंत्र में किसी भी बिंदु पर चर्चा समर्थन और विरोध के लिए जनता स्वतंत्र है। मगर हिंसा व आगजनी अथवा हिंसात्मक विरोध संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। कोई भी कानून लाये जाने से पहले उसपर गम्भीर बहस होनी चाहिए। अन्यथा कैब और एनआरसी का वही हश्र होगा जो नोट बन्दी और एस सी एस टी एक्ट का हुआ। नए कैब कानून के जरिये हमारी सरकार उनको नागरिकता देगी जो भारत में शरण लेना चाहते हैं। और फिर एन आर सी लागू करेगी ताकि आप यह साबित कर सकें कि आपके पास भारत के नागरिक है या नही। दोनों कानूनों का मूल बिंदु यही है। कानून के अंतरंग शब्दार्थों में बेशक कहीं भी धर्म अथवा सम्प्रदाय जैसे शब्दों का जिक्र नही है। यह कटु सत्य है कि देश की जनता गिरती अर्थब्यवस्था बेरोजगारी व महंगाई से त्रस्त होकर आक्रामक हो गई है। सबसे पहले इन समस्याओं से जनता को निजात दिलाना बेहद जरूरी है। वर्तमान राजनीतिक गतिविधियों का सर्वाधिक दुखद पहलू यह है कि इन जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढने के बजाय जनता का ध्यान भटकाया जा रहा है। पक्ष विपक्ष दोनों तरफ से जनता को आक्रामक गतिविधियों के लिए उकसाया जा रहा है। मौब लीचिंग जैसी कुप्रव्रीति पनप रही है। जनता आवेश में आकर राष्ट्र की संपत्ति को स्वाहा कर रही है। आम जनता के सवालों पर अपनी जिम्मेवारी से दोनों पक्ष भाग रहे हैं। पक्ष और विपक्ष घुसपैठियों पर एक दूसरे के साथ रिश्तेदारी का सम्बंध रखने का आरोप लगाते हैं। आजादी के बाद से दूसरे देशों से आवाजाही के कायदे कानून बने हुए हैं। समूचे देश में जनगणना होती है। आधार कार्ड सहित परिचय पत्र के अनेक माध्यम मौजूद हैं। एक एक नागरिकों पर सख्त व पैनी नजर रखने के लिए तंत्र का जाल बिछाया गया है। आजादी के बाद से देश के प्रत्येक जिले में डीएम एसपी सीओ बीडीओ थानाध्यक्ष प्रत्येक गांव के लिए कर्मचारी सिपाही चौकीदार नियुक्त हैं। यदि देश में अनधिकृत आये और रह गए इसका मतलब देश में प्रचलित तंत्र में भयंकर खामियां थीं जिन्हें ठीक करने में सरकारों की रुचि नहीं रही। आप अपने तंत्र को ठीक करने के बजाय हवा में तीर चला रहे हैं। देहात में एक कहावत है कौवा कान लिए जा रहा है तो समझदार कान की जांच पहले करते हैं और मूर्ख कौवे के पीछे दौड़ते हैं। क्या यह सही है तंत्र को धत्ता बताकर देश का मुखिया अपने सबसे बड़े दुश्मन के उत्सव में शरीक हो सकता है। देश की सुरक्षा के सबसे महत्वपूर्ण सड़क पर जहां परिंदे भी पर नही मार सकते वहां एक ट्रक विस्फोटक लाया जा सकता है। पक्ष विपक्ष वोट बैंक की राजनीति को शीर्ष पर रखकर देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर रहा है। जनता दंगाई बन रही है देश भक्ति की चर्चा बेमानी सी लगने लगी है। देश के लिए बलिदान देने की दुहाई देने वालों के कितने अपने मारे गए कितने माननीयों का सर फूटा। गणना कर लीजिए। अयोधया कांड में कितने सांसद विधायक मरे। 1984 के दंगों में गुजरात के दंगों में कितने जन प्रतिनिधि मरे। आकलन कर लें। आपकी नाक के नीचे देश भक्ति जैसे शब्द का बलात्कार दर बलात्कार हो रहा है। और आप चैन की नींद सो रहे है।
कैब और एनआरसी उन लोगों के लिए शामत बनकर आई है जिनके पास सिर ढंकने के लिए छत नही और तन ढंकने के लिए वस्त्र नही है। वे क्या खाक अपनी नागरिकता साबित कर पाएंगे। जिन लोगों के सब कुछ हर साल बाढ़ में बह जाते हैं आग में जल जाते हैं। कौन सा प्रमाण पत्र है भूमिहीनों के पास।
विदेशों से लोग लोकतंत्र की जननी भारत में पधार रहे हैं। जहां महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी नही बच्चों को कुपोषण से बचाने की सुविधा नही। जहां के विश्वविद्यालयों में शब्दों की मार के स्थान पर डंडे की बौछार है। आइये स्वागत है आप भी 25 50 हजार का कर्जदार नागरिक बनिए। इक्कीसवीं सदी में भी हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर हो रहे संघर्ष का गवाह बनिए। बनाने वाले को भी अपनी तकनीक पर तरस आता होगा की क्या खूबसूरत इंसान बनाया। जो एक दूसरे की भूख मिटाने में मददगार बनने के बजाय एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं। गरीब और गाय प्रताड़ित होते रहे हैं और होते रहेंगे। मुबारक हो कैब और एनआरसी।