नीतीश कुमार के बिना क्यों बेचैन तीसरा मोर्चा!
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नीतीश को समझना सबके बूते की बात नहीं
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दैनिक खोज-खबर के लिए सीवान ( बिहार) से राकेश सिंह लववंशी
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व्यापक जनाधार का नेता नहीं होने के बावजूद नीतीश कुमार को गणितीय जोड़-तोड़ में महारत हासिल है।हालांकि उनके समर्थक हमेशा से उनको एकला चलों की बात करते रहे हैं।लेकिन नीतीश ने अभी तक यह खतरा नहीं मोला है।इनके बारे में यह कहा जाता है कि जब सहयोगी सशक्त हो  तो नीतीश खुद किनारा पकड़ने की राह अपनाते हैं और सहयोगी कमजोर हो तो सबको किनारे लगाने का हुनर भी उन्हें आता है.
एक तिनका भी खड़-खड़ाये तो मीडिया हाय-तौबा मचाने लगता है।मीडिया तो पिछले डेढ़ वर्षों में आधा दर्जन बार गठबंधन तोड़ चुका है।लेकिन क्या गठबंधन टूटा ?
नीतीश को समझना सबके बस की बात नहीं।आज की राजनीति के सबसे जटिल नेता हैं नीतीश।जिद्दी भी हैं।
नीतीश मीडिया के इस रवैये पर खूब लुत्फ लेते होंगे. सुबह के अखबार पढ़ते हुए, काली चाय की सोंधी खुश्बुओं की चुस्कियों के साथ मुस्कराते हुए.
तभी तो दिल्ली से ले कर बिहार तक के भाजपाई लार टपका-टपका के बेचैन हो उठते हैं.
यह बात याद रखिए नीतीश कुमार ने जिस मोदीयुग के खिलाफ एनडीए छोड़ा, वह युग अभी जारी है. यह अलग बात है कि यहाँ नीतीश के लिए रिक्ति नहीं है ।पर यह भी याद रखिये कि नीतीश की राजनीति का अपना अलग अंदाज है. वह भाजपाइयों को लार टपकाते हुए देख कर आनंदित होते हैं तो राजद को भभकी दे दे कर गठबंधन को अपनी गिरफ्त में रखना चाहते हैं.
वैसे मान लिया जाये कि नीतीश ने गठबंधन के राष्ट्रपति प्रत्याशी का समर्थन न भी किया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा. एनडीए में रहते हुए नीतीश ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था. एनडीए तब कहा टूटा ?
ये जगजाहिर है की बिहार की राजनीति में भले ही राजद ने जेडीयू से ज्यादा सीटें हासिल की है पर ये सब हुआ है सिर्फ नीतीश कुमार जी के नाम पर ही क्योंकि जेडीयू ने अपने परम्परागत वोटों को पुरी तरह से राजद को ट्रांसफर करा दिया था पर दुसरी तरफ राजद अपना परम्परागत वोटों को पुरी तरह से जेडीयू की तरफ ट्रांसफर कराने में नाकाम रहा है पर अंत भला शो सब भला सरकार बनी माननीय नीतीश कुमार जी मुख्यमंत्री बने।  
संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई लालू यादव जी ने पत्रकारों को बताया की अब हम नीतीश कुमार जी के साथ बिहार के बाहर भी गठबंधन बनायेंगे और बीजेपी के खिलाफ बडा मोर्चा बनायेंगे,  सब सही से चल रहा था फिर उतर प्रदेश चुनाव की घोषणा हुई नीतीश कुमार जी महागठबंधन के लिए आगे आए उतर प्रदेश में धड़ाधड़ रैलियां करनी शुरू की और गठबंधन की बात तो सबसे पहले लालू प्रसाद यादव ने ही अपनी रिश्तेदारी और जातिय राजनिति को बनाये रखने के चक्कर मे धोखा दिया,  मायावती को अपने सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले पर घमंड था ही तो उन्होने बात सुनने की भी कोशिश नहीं, तो वही दुसरी तरफ बिहार चुनाव में धोखा देने वाली समाजवादी पार्टी के व्यवहार से परिचित नीतीश कुमार जी ने अखिलेश यादव और मुलायम यादव ने बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी पर गठबंधन की बात करते रहे, वही कांग्रेस ने बिहार चुनाव में धोखा देने वाली सपा से चोरी चोरी करके गठबंधन बना लिया और चुनाव में ताल ठोक दी।  इन सब पार्टीयो का व्यवहार देखकर माननीय नीतीश कुमार जी उतर प्रदेश का चुनाव ना लडने के घोषणा कर दी। 
उतर प्रदेश चुनाव हुआ रिजल्ट आया सबकी मिट्टी पलीद  हो गई अखिलेश यादव को उनकी असलियत पता चली और समाजवादी पार्टी को उसके धोखेबाजी की सजा मिली,  माया का घमंड चूर चूर चकनाचूर हो गया,  कांग्रेस की हेकड़ी बंद हो गई,  लालू यादव की जातीय और पारिवारिक सोच की राजनीति पर रूकावट हुई। 
अब जब सब की लुटिया डूब चुकी है तो सबको नीतीश कुमार जी याद आ रही है कह रहे हैं की काश हमने नीतीश कुमार जी की बात मान ली होती तो आज ये दिन देखने को ना मिलता,  अब सब के साथ बैठे है आगे की रणनीति बनाने के लिए पर सबसे पहले बात यही पर आकर रुक जा रही है की हमारा नेतृत्व कौन करेगा……  राहुल मे वो नेतृत्व नही की सबको साथ लेके चल सके 
माया ने हार मान ली है बस किसी तरह से पार्टी जिंदा रहे यही बहुत है 
अखिलेश यादव के साथ गैर यादव ओबीसी चलने को तैयार नहीं साथ साथ उनके शासनकाल के खुल रहे भ्रष्टाचार उनके लिए रूकावट पैदा कर रहे हैं यही नहीं उनका तानाशाही और सामंती पोषक रवैया भी उनके लिए बाधक बन रहा है तो वही लालू यादव परिवार और जाति से आगे अब कुछ सोच नही पा रहे है 
अब सिर्फ एक नाम बच रहा है जिसके नाम पर सबकी सहमति बन रही है,  जिसे विकास पुरूष के नाम से जाना जाता है,  जिसके उपर परिवारवाद और जातिवाद का पहरा नही है वो शख्स माननीय नीतीश कुमार जी है,  पर नीतीश कुमार जी अभी कुछ भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है क्योकि उन्हें इन लोगो की असलियत अच्छे से पता है……
दर असल नीतीश चीजों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए अपने पत्ते चलते हैं. कोशिश करते हैं कि वह अपनी महत्वकांक्षा को खुद प्रकट ना करें. बस हालात ऐसे बना दें कि बाकी लोग बेबस हो कर उनको स्वीकार कर लें. आने वाले दिनों में महागठबंधन का विस्तार होना है. तब प्रधान मंत्री पद के कंडिडेट की खोज की जायेगी. दावेदार कई होंगे. संभव है नीतीश इसी अनुरूप अपने पत्ते चल रहे हैं. बस देखना दिलचस्प होगा कि 2019 तक क्या क्या खेल होता है.