गणगौर पर्व:गुंज रहे गोर गोर गणपति के बोल
आजाद नेब
जयपुर 17 मार्च। गोर-गोर गणपति, ईसर पूजे पार्वती, पार्वती का आला गिला, गोर का सोना का टीका, दे टमका दे, बाला रानी व्रत कर्यो, खेरो खाटो लाडू दियो लाडू ले बीरा नै दियो बीरो म्हाने चूनड़ दी चूनड़ म्हाने गोर उड़ाही गोर म्हाने सुहाग दियो भाग दियो…! फिलहाल शहर के कोने-कोने में नवविवाहिताओं के बीच यह गीत गूंज रहा है। धुलंडी के साथ ही पारंपरिक पर्व गणगौर की शुरुआत हो गई। 
सोलह दिवसीय इस फेस्ट में दिन-प्रतिदिन उत्साह परवान चढ़ रहा है। युवतियां, न्यूली मैरिड व शादीशुदा महिलाएं सुबह स्नान आदि करके ईसर-गणगौर की पूजा अर्चना में जुटती है। डेढ़-दो घंटे खूब गीत गाए जाते है। इनमें अच्छे वर की प्राप्ति, पति की लंबी आयु की कामना की जाती है। शिव-पार्वती के रूपों की आराधना कर सुख-शांति, खुशहाली प्रदान करने का आग्रह किया जाता है।
35 साल से पूज रहे एक घर में नित्यानंद नगर बी के एक घर में गणगौर 35 साल से पूजी जा रही है। स्थानीय कमला कंवर, शशिकंवर ने बताया कि जब वे यहां रहने आए तब आस-पास गणगौर पूजने का कोई ठिकाना नहीं था। उसके बाद उन्होंने अपने घर में गणगौर पूजन की ठानी और शुरू हो गए। तभी से हर साल गणगौर की तैयारी कॉलोनी की सारी महिलाएं पहले से करने लगती है। 
कॉलोनी में जब भी किसी युवती की शादी होती है वह उनके यहां आकर ही गणगौर की पूजा करती है। कई तो ऐसी महिलाएं भी है जिन्होंने यहीं पर गणगौर पूजी आज उनकी बेटियां पूजन के लिए आ रही है। मेल-मिलाप का जरिया बना यह त्योहार कॉलोनी की उर्मिला सैनी,गुलाब कंवर का कहना था कि वे खुद बरसों से नित्यानंद नगर बी के इस घर में पूजा-अर्चना का हिस्सा बन रही है । गणगौर पूजन से जुड़े हर काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। इस बहाने आस-पास की महिलाओं से संपर्क हो जाता है। हम तो पूरे साल इस पर्व का इंतजार करते है। जब रोज मेल-मिलाप हो जाता है। फिलहाल माहौल किसी शादी के जैसा है जिसमें कॉलोनी ही नहीं दूर-दूर से महिलाएं यहां आ रही है। ऐसा ही आलम खातीपुरा, कुमावतबाड़ी, चांदबिहारी नगर, जसवंत नगर में देखने को मिल रहा है।