किसान कह रहे ‘ये खोपड़ियां आत्महत्या कर चुके किसानों की हैं’
दैनिक खोज खबर(डेक्स): दिल्ली में हल्ला अभी यूपी का धमक रहा है लेकिन सिर्फ वही नहीं है. तमिलनाडु भी दिल्ली पहुंचा है. वहीं जहां सारे दुखियारे सरकार और सिस्टम से हारे अपनी डिमांड रखने जाते हैं. जंतर मंतर पर. लेकिन धरना पूरा अलग स्टाइल में हो रहा है. लुंगी लपेटे मर्द और गले में पत्तों की माला पहने औरतें. मर्दों के पास इंसानी खोपड़ियां हैं. ये तमिलनाडु के किसान हैं.
जंतर मंतर पर डेढ़ सौ के करीब ये किसान भिखारियों सा भेस बनाए बैठे हैं. क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार इनकी तरफ से आंखें मूंदे बैठी हैं. इनका कहना है कि हमारे पास और कोई रास्ता नहीं था सरकारों का ध्यान खींचने का. ये खोपड़ियां कैसी हैं? पूछने पर बताते हैं कि जो किसान खुदकुशी कर लिए या जो भूख से मर गए उनकी हैं.
हालत बड़ी खराब है. बिना सरकारी सहायता, बिना पानी, बिना खाद, बिना बीज, बिना मजदूरी के खेती कैसे हो. जो जिंदगी भर की जमा जथा थी, गहने जेवर सब रेहन रखकर एक बार लगा भी दे तो सूखे की वजह से फसल चौपट हो गई. सारा पैसा डूब गया. गहने बैंक के हो गए. इसी रमझल्ले में पिछले साल तकरीबन 400 किसानों ने मौत को गले लगा लिया. इनका रोना है कि सरकारें बड़ी कंपनियों का कर्ज बड़ी खुशी से माफ कर देती हैं. लेकिन किसान का नहीं. न नया कर्ज देती हैं. किसान क्या करे. पूरा तमिलनाडु सूखे की चपेट में है.
सरकारें नेता चलाते हैं. वही नेता जिनके भाषणों में तीन चार चीजों में सबसे ऊपर गरीब और किसान होता है. अगर किसी नेता का एक मिनट चुनावी भाषण सुनो तो उसमें दो चार बार किसान जरूर आ जाएगा. वैसे निबंध लिखने के लिए “भारत कृषि प्रधान देश है.” लेकिन वैसा लगता नहीं. भारत सिर्फ कृषि बखान देश है. किसानों की बात करके सत्ता में आते ही भूल जाते हैं. तमिलनाडु में राजनैतिक उथल पुथल अभी थोड़ा थमी है. जयललिता की मौत के बाद ऐसा हल्ला था कि इन किसानों की बात कोई सुन भी नहीं सकता था. लेकिन अब मजबूरी यहां तक ले आई है. इनकी डिमांड है कि सरकार हमारी पैदावार का सही दाम दिलाए लेकिन उसके पहले पैदावार में मदद करे. पुराने कर्ज माफ किए जाएं. सबका पेट भरने वाले किसान अपना पेट लेकर दर दर भटक रहे हैं. देखो सरकार की नजरे इनायत कब होती है.




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