हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति के कारण ही हम विश्व गुरु थें : रामदयाल शर्मा 
👉 सीतामढ़ी में विद्या भारती द्वारा विद्वत परिषद का किया गया गठन 👈
✍दैनिक खोज खबर ऑनलाइन वेबपोर्टल के लिए श्रीनारद संवाद सेवा 

सीतामढ़ी : 18 जनवरी : 
नैतिकमूल्यों से जुड़ी प्राचीन शिक्षा पद्धति को अपनाकर ही हम फिर से विश्व गुरु बन सकते हैं। हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति के कारण ही शिक्षा के मामले में हम विश्व गुरु कहलाते थे, जो नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों के माध्यम से याद किया जाता है। ये बातें विद्वत परिषद,  विद्या भारती बिहार क्षेत्र के संयोजक रामदयाल शर्मा 
ने गुरुवार को को सरस्वती शिशु विद्या मंदिर रिंग बांध, सीतामढ़ी  में विद्या भारती द्वारा आयोजित विद्वत परिषद की गोष्ठी को बतौर मुख्य अतिथि के रूप  संबोधित करते हुए कहीं । 

श्री शर्मा ने शिक्षा में नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित इस गोष्ठी को संबोधित करते हुए  कहा कि हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति कितनी समृद्ध थी कि सैकड़ों वर्षों तक उसे नष्ट करने का प्रयास किए जाने के बाद भी सब कुछ बची हुई है। उन्होंने गोष्ठी में बताया कि 1952 में विद्या भारती की स्थापना और 1977 से यह संस्था अखिल भारतीय स्तर पर आधारभूत शिक्षा संरचना पर काम कर रही है, ताकि चारित्रिक रूप से मजबूत भावी पीढ़ी को गढ़ी जा सके। इसलिए, हमलोगों ने नारा भी दिया है कि शिक्षा का संस्कृति से नाता, जय जननी जय भारत माता। उन्होंने संस्था द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर चलाए जा रहे ऐसे कार्यक्रमों की विस्तार से जानकारी दी।

गोष्ठी की अध्यक्षता रेणुका ठाकुर ने किया । इस मौके पर विद्वत परिषद सीतामढ़ी का गठन किया गया । प्रोफेसर  रेणुका ठाकुर को 
संयोजक व लक्ष्मीकांत ठाकुर को सह संयोजक मनोनीत किया गया । गोष्ठी का संचालन सरस्वती विद्या मंदिर के प्राचार्य शम्भू तिवारी ने किया । वही रामनरेश ठाकुर, विजयकांत चौधरी, प्रोफेसर निर्माला मिश्रा, डॉक्टर प्रतिभा साह, प्रोफेसर फनिद्र चौधरी, प्रोफेसर अखिलेश्वर ठाकुर व प्रदीप कुमार कुशवाहा को विद्वत परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया ।