सारण/इसुआपुर।
प्रखंड के शामकौरिया बजरंग चौक पर हनुमान मंदिर परिसर मे चल रहे हनुमत जयंती समारोह के 39 वें वार्षिक अधिवेशन मे आघ्यात्मिक मंच से प्रवचन करते हुए अम्बिका स्थान आमी के प्रख्यात मानस प्रवाचक शिववचन जी महाराज ने कहा कि संतो का ह्रदय नवनीत से भी सुकोमल होता है। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जब संत के ह्रदय की पावनता एवं कोमलता का गुनगान कर रहे थे तो उन्होंने लिखा- ‘संत ह्रदय नवनीत समाना।’
तभी उनके मार्गदर्शक भगवान शंकर और हनुमान जी ने ईशारा किया कि संत का ह्रदय तो नवनीत से भी सुकोमल होता है, क्योंकि मख्खन अपनी गर्मी से पिघलता है जबकि संत दुसरो की तकलीफ अर्थात पर पीड़ा से द्रवित हो जाते हैं। तभी तो गोस्वामी जी दूसरी अर्द्राली से पहली अर्द्राली को निरस्त कर दिए-
‘संत ह्रदय नवनीत समाना, कहे कविन्ह पर कहे न जाना ।
अर्थात संत का ह्रदय मख्खन सा कोमल होता है। ऐसा मैं नहीं बल्कि अन्य कवियों ने कहा है। क्योंकि वे कहना नहींं जानते थे। मेरे विचार से
निज परिताप द्रवहि नवनीता,
पर दुख द्रवहि संत सुपुनीता ।
अर्थात नवनीत निकट की गर्मी से पिघलता हैं जबकि संत दुसरों की पीड़ा को सुनकर ही द्रवित हो जाते है।
अतः संत सदैव गौ, नदी, वृक्ष, धरती, सुर्य व चन्द्र की तरह अपना जीवन परोपकार मे लगा देते हैं। तभी तो कहा है –
वृक्ष कबहुं नही फल भखे, नदी न संचय नीर।
परमारथ के कारने,साधुन धरा शरीर।।




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