
शोषितों अभिवंचितों की आवाज थे मुंशी प्रेमचंद
** प्रेमचंद की कहानी व उपन्यास आज भी सामयिक
** प्रेमचंद जी यथार्थवादी साहित्यकार थे
** क्रांतिकारी लेखक थे मुंशी प्रेमचंद
** हर काल में प्रासंगिक रहेंगे मुंशी प्रेमचंद
कुमुद रंजन सिंह की रिपोर्ट-
बिहारशरीफ,बबुरबन्ना-नालंदा : 31 जुलाई 2020 दिन शुक्रवार को स्थानीय बिहारशरीफ के बबुरबन्ना मोहल्ले में साहित्यिक मंडली “शंखनाद” के तत्वावधान में सविता बिहारी निवास स्थित सभागार में हिंदी-उर्दू और फारसी के उद्भट विद्वान, क्रांतिकारी लेखक, हिन्दी के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की 140 वीं जयंती समारोह मंगल दीप जलाकर मनाई गई।
यह कार्यक्रम कोरोनावायरस संक्रमण के चलते सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए किया गया।
जयंती समारोह की अध्यक्षता साहित्यिक मंडली “शंखनाद” के अध्यक्ष साहित्यकार डॉक्टर लक्ष्मीकांत सिंह ने तथा संचालन “शंखनाद” के सचिव शिक्षाविद् राकेश बिहारी शर्मा ने किया।
अध्यक्षीय सम्बोधन में साहित्यकार डॉ० लक्ष्मीकांत ने हिन्दी के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा- प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से भारत के दलित एवं उपेक्षित वर्गों को वाणी प्रदान की। प्रेमचंद वस्तुतः समूचे मानवतावादी साहित्यकार थे। प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित, अपमानित और उपेक्षित के कृषकों की आवाज थे। प्रेमचंद जी में दो प्रकार के उपन्यास लिखे राजनीतिक और सामाजिक इनमें समग्र रूप से भारतीय जीवन की बहुमुखी समस्याएँ चित्रित की है। प्रेमचंद जी एक गंभीर विचारक एवं चिंतनशील व्यक्ति थे। प्रेमचंद ने धार्मिक अंधविश्वासों के विरुद्ध भी खूब लिखा। वह हिंदी के प्रथम मौलिक एवं युग-परिवर्तक उपन्यासकार थे। प्रेमचंद के संपूर्ण साहित्य में आदर्श और यथार्थ का संगम है। लोगों ने प्रेमचंद को गोर्की की संज्ञा देते हैं। हमारी राय में तो प्रेमचंद केवल प्रेमचंद थे।
समारोह का संचालन करते हुए “शंखनाद” के सचिव शिक्षाविद् राकेश बिहारी शर्मा ने कहा- भ्रष्टाचार उस समय भी था और आज भी है इस लिए प्रेमचंद की कहानियां व उपन्यासों में कही गई बातें आज भी प्रासंगिक हैं। वर्षों पूर्व उन्होंने इस बात का चित्रण कर लिया था जो आज हमारे जीवन व संस्कारों से जुडे हुए हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद किसानों व मजदूरों तथा लाचारों के कथाकार थे। प्रेमचंद जी अपनी हर कृति को इतने समर्पित भाव से रचते कि पात्र जीवंत होकर पाठक के ह्रदय में धड़कने लगते थे। यहां तक कि पात्र यदि व्यथित हैं तो पाठक की पलक की कोर भी नम हो उठती। पात्र यदि किसी समस्या का शिकार है तब उसकी मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति इतनी प्रभावी होती है कि पाठक भी समाधान मिलने तक बेताबी का अनुभव करता है। वे स्वयं आजीवन जमीन से जुड़े रहे और अपने पात्रों का चयन भी हमेशा परिवेश के अनुसार ही जीवन्तता से किया।
उन्होंने बताया कि मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के गांव लमही में हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल और माता का नाम आनंदी देवी था। उनका बचपन गांव में बहुत कष्ट से बीता। उन्होंने गांव के ही एक मौलवी से उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा हासिल की। 1818 में उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। वे कुछ दिनों के बाद एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापन का कार्य करने लगे और कई पदोन्नतियों के बाद वह डिप्टी इंस्पेक्टर बन गए। उच्च शिक्षा उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उन्होंने अंग्रेज़ी सहित फ़ारसी और इतिहास विषयों में स्नातक किया था। बाद में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में योगदान देते हुए उन्होंने अंग्रेज़ सरकार की नौकरी छोड़ दी। मुंशी प्रेमचंद जी ने अपने जीवन में कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें तथा हजारों की संख्या में लेख आदि की रचना की। 8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर रोग से मुंशी प्रेमचंद की मौत हो गई। उनकी स्मृति में भारतीय डाक विभाग ने 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के मौक़े पर 30 पैसे मूल्य का डाक टिकट जारी किया। इसके अलावा गोरखपुर के जिस स्कूल में वह शिक्षक थे, वहां प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई। आज के बढ़ते विज्ञान के युग में साहित्य के प्रति छात्रों की लगातार घट रही रूचि को बढ़ाने के लिए साहित्य व साहित्यकार प्रेमचंद जैसे शख्सियतों की जयंती मनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने प्रेमचंद जी को यथार्थवादी साहित्यकार बताया।
समाजसेवी अनिल पासवान ने कहा- मुंशी प्रेमचंद जैसा न कोई हुआ और न ही शायद होगा। उन्होंने उच्च जाति का निम्न जाति पर जो हो रहे अत्याचारों को अपनी कहानियों में पिरोया है वो वाकई सराहनीये है। निम्न जाति के बंद आवाज को प्रेमचंद ने अपनी कहानियों, कविताओ में बड़ी सहजता से चित्रण किया है।
समाजसेवी धीरज कुमार ने कहा- मुंशी प्रेमचंद क्रांतिकारी रचनाकर थे। वह समाज सुधारक और विचारक भी थे। उनके लेखन का मक़सद सिर्फ़ मनोरंजन कराना ही नहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान आकर्षित कराना भी था। वह सामाजिक क्रांति में विश्वास करते थे। वह कहते थे कि समाज में ज़िंदा रहने में जितनी मुश्किलों का सामना लोग करेंगे, उतना ही वहां गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खु़शहाल होंगे, तो समाज में अच्छाई ज़्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। मुंशी प्रेमचंद ने शोषित वर्ग के लोगों को उठाने की हर मुमकिन कोशिश की। उन्होंने आवाज़ लगाई- ऐ लोगों, जब तुम्हें संसार में रहना है, तो ज़िंदा लोगों की तरह रहो, मुर्दों की तरह रहने से क्या फ़ायदा।नालन्दा के नामचीन संगीत सम्राट अशोक सिंह ने कहा- प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के भारतीय लेखकों में से एक हैं। जिनकी कृतियों में हमेशा शोषितों की आवाज बनकर रहते थे। उनकी लेखनी में सामंती व्यवस्था पर कटाक्ष रहता है। उनके लेखनी में सदैव समाज के कमजोर, बेबस को मुख्य पात्र बनाकर चित्रण करना उनकी दृष्टि को उजागर करता है।इस अवसर पर समाजसेवी ब्रज भूषण प्रसाद, समाजसेविका सविता बिहारी, शिक्षक ब्रज लाला कुमार, स्वाति कुमारी, समाजसेवी अरुण बिहारी शरण, मौजूद थे।




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