शिल्हौरी शिलानाथ मंदिर में महाशिवरात्रि पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने किया जलाभिषेक

● गुरुवार की अहले सुबह से दोपहर बाद तक श्रद्धालुओं का लगा रहा तांता

मढ़ौरा (सारण)। गुरुवार को शीलहौरी के ऐतिहासिक शिलानाथ मंदिर में महाशिवरात्रि पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक किया।महाशिवरात्रि को लेकर अहले सुबह से श्रद्धालुओं का दोपहर बाद तक जलाभिषेक के लिए तांता लगा रहा।इसबार कोरोना काल के बाद पाबंदियां खत्म होने के बाद महाशिवरात्रि को कुछ श्रद्धालुओ में खासा ही उत्साह दिखा और मंदिर परिसर में काफी संख्या में भीड़ जुटी थी।स्थानीय लोगों की माने तो एक लाख से अधिक की संख्या में श्रद्धालु महिला और पुरुष मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग का दर्शन कर जलाभिषेक किया है।

प्रशासन ने सुरक्षा व ट्रैफिक की चाक चौबंद की व्यवस्था :

महाशिवरात्रि को लेकर मंदिर में भीड़ नियंत्रण को लेकर प्रशासन भी अपनी ओर से चाक चौबंद व्यवस्था कर रखा था। मढ़ौरा डीएसपी इंद्रजीत बैठा और थानाध्यक्ष सह इंस्पेक्टर के पद पर आसीन ट्रेनी डीएसपी राजीव कुमार ने भी व्यवस्था का मुआयना कर तैनात पुलिस अधिकारियों को आवश्यक दिशा निर्देश दिये।वहीं मढ़ौरा सीओ रविशंकर पांडे व अन्य मजिस्ट्रेट भी विधि व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे,जिससे कि श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि के जलाभिषेक में किसी प्रकार की असुविधा न हो। वहीं मंदिर कमिटी द्वारा मंदिर का गर्भ गृह , मुख्य द्वार औऱ परिसर कों फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था।

प्रचीन व ऐतिहासिक मंदिर की मान्यताएं:-

ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व वाले उक्त मंदिर की चर्चा धार्मिक ग्रंथ शिवपुराण में भी है। यह वह स्थान है जहां देवऋषि नारद का मोह भंग हुआ था। एक अतिप्रचलित कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारद को अपने ब्रह्माचर्य का अभिमान हो गया था। तब स्वयं भगवान हरि ने माता लक्ष्मी के साथ मिलकर मायानगरी की रचना की थी। महाराज शिलनिधि यहां के राजा बने और उनकी पुत्री के रूप में लक्ष्मी ने स्वयं विश्वमोहिनी के रूप में अवतार लिया। राजा ने समय के साथ पुत्री विश्व मोहिनी के युवा होने पर स्वयंवर का आयोजन किये। बड़े-बड़े राजाओं के साथ देवर्षि नारद भी हरि से उनका रूप मांग कर स्वयंवर में पहुंचे। विश्व मोहिनी स्वयंवर का माला लिए नारद के सामने से आगे बढ़ गयी। इससे अचंभित नारद बार-बार अपना रूप दिखाने के लिए मोहिनी के सामने आने लगे। तब हरि के गणों ने उन्हें कुएं में उनका रूप दिखलाने ले गये। जहां हरि की सूरत में वानर की सूरत देखकर उन्हें श्री हरि पर क्रोध आ गया। इसी बीच मोहिनी साधारण रूप धारण कर आये हरि को वरमाला डाल उनका वरण कर लिया। तब क्रोधित नारद ने हरि को श्राप दिया- कि जिस तरह पत्‍‌नी वियोग की पीड़ा में मैं तड़प रहा हूं आप भी तड़पोगे। उस समय यह वानर ही आपके काम आयेगा। इतिहास साक्षी है श्री हरि विष्णु के राम रूप में अवतार पर पत्‍‌नी सीता के वियोग में तड़पना पड़ा था। संकट की इस स्थिति में वानरों की सेना ही प्रभु श्रीराम की सहायक हुई थी। देवर्षि नारद के श्राप के बाद देवताओं ने नारद को समझाया था। तुम्हारे कल्याण के लिए ही श्रीहरि ने लीला रचाया था ताकि तुम्हारा ब्रह्माचर्य न टूटे और तुम माया के मोह से मुक्त रह सको। ऐसा कहा जाता है कि उक्त कुआं आज भी मंदिर से सटे पश्चिम भाग में स्थित है। अपभ्रंश हो चुके उक्त कुएं में वर्षो पूर्व तक सामान्य व्यक्ति का भी चेहरा वानर जैसा दिखाई देता था। वर्तमान में कुआं अब मात्र प्रतीक के रूप में मौजूद है। यहां मौजूद मंदिर का शिवलिंग महाराज शिलनिधि के कुलदेव का रूप है। इस प्रकार यह मंदिर पौराणिक स्थल की हैसियत रखता है। छपरा शहर संग्रहालय में शिलानाथ शिल्हौड़ी के उमा माहेश्वर की दसवीं सदी की मूर्ति आज भी सुरक्षित रखी गयी है। मंदिर परिसर में उस प्रकार की प्रस्तर मूर्तियां आज भी विद्यमान है।
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