बेतिया – धार्मिक यात्राओं पर सरकारी सहायता और अदालती आदेश पर विशेष-सम्पादकीय
 न्यूज इनपुट विजय कुमार शर्मा की कलम से :–         
लोकतंत्र में सरकार का गठन देश की जनता करती है और सरकार जनता के हित में काम करती है। जनता ही सरकार बनाती और बिगाड़ती है इसलिए सरकार का दायित्व बनता है कि वह जनता की संसारिक आवश्यकताओं के साथ उनकी धार्मिक भावनाओं की पूर्ति में सहायक बने। हमारा देश लोकतांत्रिक मर्यादाओं वाला ऐसा धर्मनिरपेक्ष गुलदस्ता है जिसमें अनेकों प्रकार के फूल उसकी शोभा को बढ़ा रहें हैं।सरकार जनता के लिए तमाम तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है इसमें उसकी धार्मिक भावना भी शामिल हैं।सरकार मुसलमानों को हज जाने के लिये ही नहीं बल्कि हिंदुओं को भी कैलाश मानसरोवर जैसी यात्राओं के लिए सहायता देती है। जनता की धार्मिक भावनाओं की पूर्ति के लिये सरकार की इन धार्मिक योजनाओं का लाभ अबतक मिल रहा था।गतवर्ष दो हजार बारह में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले के जरिये इन धार्मिक यात्राओं के लिए सरकारी अनुदान देने की परम्परा पर रोक लगाने के लिए कहा था। दो हजार बारह से अबतक वोटबैंक के चक्कर में डर के मारे इस अदालती फैसले को यथार्थ स्वरूप नहीं दिया था। सरकार जो अबतक धार्मिक यात्राओं के नाम पर अनुदान दे रही थी उसमें हिंदुओं के जीवन का अंतिम लक्ष्य चारोधाम यात्रा होती हैं।हर व्यक्ति अपने पितरों को तारने के लिये चारों धाम की यात्रा करना चाहता है लेकिन मात्र चालीस फीसदी ही लोग अपनी इच्छा पूरी कर पाते हैं और बाकी लोग धनाभाव में यात्रा नहीं कर पाते हैं।सरकार मुसलमानों के हज  के लिए भले सहायता योजनाएं चला रही थी लेकिन चारोधाम यात्रा पर सुविधा सहायता कुछ नहीं दे रही थी। सरकार ने चारोधाम यात्रा सुविधा उपलब्ध कराने की जगह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुपालन की शुरूआत हज यात्रा अनुदान बंद करके कर दी है।अदालत के कुछ फैसले कभी कभी आप्रंसागिक और अव्यवहारिक लगने लगते हैं।धर्म प्रधान धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में गरीब और मध्यम वर्ग को उनकी धार्मिक आस्था का आदर करना अगर उचित नहीं है तो क्या उद्योगपतियों का करोड़ों रुपये बैंक का बकाया माफ करना उचित है? अदालत ने कभी अन्य तमाम तरह के सरकारी फिजूल खर्चों पर गौर न करके सीधे आमजनता की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात करके सहायता बंद करने का फैसला सुना दिया।अदालत को सिर्फ जनता को दी जाने वाली सरकारी सहायता ही दिखाई पड़ती हैं और वह बार बार उसे बंद करने पर जोर दे रही है।सरकार भी जनता को मिलने वाली सहायता को कलंक मानकर धीरे धीरे उसे बंद करने की दिशा में अग्रसर हो रही है। एक बात तो सही है कि जो लोग सक्षम हैं वह सरकारी सहायता के पात्र नहीं हैं लेकिन जो गरीब लोग हैं उन्हें धार्मिक यात्राओं खासतौर पर हज और चारोधाम की यात्रा के लिए सरकारी सुविधा सहायता दोनों उपलब्ध होना चाहिए।सरकार ने अदालत के आदेश के अनुपालन में हज के लिये भले सब्सिडी बंद कर दी हो किन्तु इसमें पात्रता के आधार पर सुधार करके पुनः लागू करने की जरुरत है।आमजनता की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना अदालत और सरकार दोनों का दायित्व बनता है।