नीरज कुमार/दैनिक खोज खबर/मढ़ौरा(सारण)। बिहार में होली आई है। गलियों में अबीर है, चौक-चौराहों पर गुलाल उड़ रहा है। लेकिन सत्ता के गलियारों में रंग कुछ अलग ही तरह से उड़ाए जा रहे हैं। यहां रंग पानी से नहीं, बयान से बदलते हैं।
        कहते हैं होली रंगों का त्योहार है। पर बिहार की राजनीति में रंग स्थायी नहीं होते। यहां रंगों की अपनी राजनीतिक उपयोगिता है। कल तक जो हरा था, आज केसरिया है। जो कल केसरिया था, वह फिर हरा होने की तैयारी में है। जनता सोचती है कि यह “रंगोत्सव” है या “रंगपरिवर्तन महोत्सव”?
        मुख्यमंत्री जी का व्यक्तित्व बड़ा विलक्षण है। वे ऐसे होलियार हैं जो पिचकारी भी खुद चलाते हैं और रंग भी खुद चुनते हैं। राजनीति में स्थिरता की बात करते हुए भी गठबंधन की रंग-पट्टिका बदलने की कला में पारंगत हैं। मानो वे आधुनिक राजनीति के ‘रंगरेज’ हों—जहां कपड़ा वही रहता है, बस रंग बदलता जाता है।
     होली में लोग पुराने गिले-शिकवे भूल जाते हैं। लेकिन यहां तो हर नई होली पर पुराने बयान नए रंग में सामने आ जाते हैं। कभी “सिद्धांत” गुलाल की तरह उड़ते हैं, कभी “विकास” अबीर बनकर आंखों में चला जाता है। जनता आंख मलती रह जाती है और सत्ता मुस्कुराती रहती है।
     गांवों में अभी भी टूटी सड़कों पर बच्चे सूखे रंग से खेल रहे हैं। बेरोजगार युवा अपने भविष्य की पिचकारी में पानी ढूंढ रहे हैं। किसान के खेत में फसल से ज्यादा कर्ज उग रहा है। पर सत्ता के मंच से घोषणा होती है—“सब चंगा है!” लगता है मानो ढोलक की थाप पर सच को भी नचा दिया गया हो।
यह वही बिहार है जिसने जयप्रकाश नारायण का ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा सुना था। यह वही धरती है जहां राममनोहर लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद की बुनियाद रखी थी। उस विरासत की होली आज कुछ फीकी-सी लगती है। विचारधारा के रंग अब स्थायी नहीं, अवसरवाद के पानी में घुलनशील हो गए हैं।
होली का असली रंग तो तब आएगा जब राजनीति में पारदर्शिता होगी, जब गठबंधन गणित से ज्यादा जनता का विश्वास मायने रखेगा। जब रंग बदलने की जगह व्यवस्था बदलने की परंपरा शुरू होगी।
तब तक बिहार की जनता हर साल यही देखेगी—
सत्ता की होली में रंग ज्यादा,
पर आम आदमी की जिंदगी में रंग कम।
और अंत में बस इतना ही—
“बुरा न मानो होली है” कहकर अगर हर राजनीतिक कलाबाजी को ढक दिया जाएगा, तो एक दिन जनता भी कहेगी—
“अबकी होली, हिसाब वाली।”