प्रेरणा-प्रसंग :गर्माहट रहे, गर्मी न हो…!
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ऐ राजनीति तेरी खातिर हम अपनों से लड़ने लगे…
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प्रेरक लेख संकलन-कुमुद रंजन सिंह, पत्रकार ।।

एक दिन दिनाकरन जी के पास एक फोन आया, ‘हेलो दिनाकरन! पहचाना?’ कुछ देर पहेलियाँ बूझने के बाद पता चला कि दूसरी तरफ उनके कॉलेज के दिनों का साथी प्रतीक है. एक पल में उम्र की सलवटें ग़ायब हो गईं. दोनों अपने परिवार और कामकाज के बारे में एक दूजे को बताने लगे.

दोनों मुंबई में रहते हैं. घरों में बस 10 मिनट की दूरी, फिर भी कभी मिले नहीं! अगले ही रविवार को दोनों परिवार सहित मिले. एक दूसरे के सम्पर्क में कौन-कौन दोस्त हैं? इसकी एक सूची बनायी गयी. और देखते ही देखते पूरा कॉलेज-कुनबा फिर से एकजुट हो गया.

दिनाकरन जी ने एक व्हाट्सअप ग्रुप बना लिया. सभी दोस्तों को एक दूसरे की ख़बरें मिलने लगीं. एक दोस्त की बेटी को आय.आय.टी. में प्रवेश मिला तो सभी ने बधाइयों के अंबार लगा दिए. साथ ही मज़ाक भी हुआ–कि भाई तुम तो पढ़ने में फिसड्डी थे, बेटी तुम्हारी ही है न! एक दोस्त के बेटे ने भारत की तरफ से एशियाई खेलों में शिरकत की, सबका सीना चौड़ा हो गया. ये बात सबने अपने सहकर्मियों को बताई. जब भी भारत का कोई नया उपग्रह आकाश में उड़ता तो खबर आती कि ‘इसरो’ में काम करनेवाले एक दोस्त ने भी उसमें अपना योगदान दिया है. सबको अच्छा लगता.

लेकिन फिर ग्रुप की फिज़ा बदली. एक दोस्त ने PM की तारीफ़ में कुछ लिखा, अन्य लोगों ने भी इसका समर्थन किया. ये बात एक दोस्त को नागवार गुज़री. उसने घंटों तक रिसर्च कर के ये बताया कि तारीफ़ का आधार ही गलत था, आंकड़े तोड़-मरोड़ कर पेश किये गए थे. अब कोई भी विषय का विशेषज्ञ नहीं था पर सुनी सुनाई बातों के आधार पर एक ‘शास्त्रार्थ’ शुरू हो गया. और जैसा कि इन बहसों में अक्सर होता है, बाकी मित्रों ने पलटवार किया कि ‘तुम देश के दुश्मन हो!’ असमर्थक मित्र के दिल को गहरी ठेस पहुंची. उसने बताया कि वो हर साल टैक्स भरता है, कि उसने भी कारगिल-युद्ध के शहीदों की मदद के लिए दान दिया था. और सबसे बड़ी बात उसके बड़े भाई सेना में हैं. उसने कहा, ‘बात करने से कोई देशभक्त नहीं होता. तुम लोग पढ़े लिखे अनपढ़ हो!’

दिनाकरन जी को समझ न आया कि एक दूसरे से इतना प्यार करनेवाले दोस्त एक दूसरे के खिलाफ ऐसा जहर कैसे उगल सकते हैं? जो लोग कॉलेज के ज़माने में कभी एक दूसरे का साथ न छोड़ते थे, किसी भी मुद्दे पर कंधे से कंधा मिलकर खड़े होते थे अचानक उनको ये क्या हो गया है…
*छोड़ के शालीनता बदतमीजियां करने लगे..*

*ऐ राजनीति तेरी खातिर हम अपनों से लड़ने लगे…* ` उन्होंने लिखा …..मैं जब भी ग्रुप देखता हूँ तो यही बातें दिखती हैं: इसको वोट दो. उसको मत दो. ये चोर है, वो बेइमान है. क्या हम आपस में मिलते हैं तो ये बातें करते हैं ? ग्रुप का मकसद एक दूसरे के साथ अपनी ज़िन्दगी के सुख-सुख बांटना है. एक दूसरे की सहायता करना है. इस ग्रुप के कारण एक दूसरे के प्रति वैमनस्य आये इससे बेहतर है कि हम ग्रुप को ख़त्म कर दें. ताकि जब मिलें तो आपस में प्यार से मिलें!

बात दोस्तों को समझ आयी. ग्रुप बरकरार रहा. चुनाव तो आएंगे और चले जाएंगे. दोस्ती में कड़वाहट आयी तो वो नहीं जायेगी.
कार्य बिंदु : राजनीतिक बहसों से बचिए. अपने काम और अपने संबंधों को प्राथमिकता देना ही बेहतर है.