धर्म व समुदाय के नाम पर हिंसात्मक प्रतिरोध के बजाय स्वधर्म की सबलता व मानवीय संवेदना के लिए कार्य करना जरूरी : मनोज कुमार सिंह

छपरा(सारण): इन दिनों धर्म व समुदाय के नाम पर देश में हिंसा का प्रचलन बढ़ा है। मॉब लीचिंग का वारदात दिन ब दिन सभ्य समाज के माथे का कलंक बनता जा रहा है। धर्म के नाम पर हो रही हिंसा में अनेक निर्दोष भी मॉबलीचिंग के शिकार हो रहे हैं। मानवीय संवेदना तार तार होकर रह गई हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आजकल लोगों में हमलों के शिकार अथवा दुर्घटना में जख्मी को अस्पताल पहुंचाने के बजाय सोशल मीडिया पर पीड़ित का खून से लथपथ क्षत विक्षत शरीर दिखाने तथा उसकी चीख पुकार का विडियो साझा करने की होड़ सी लगी हुई है। यह तथाकथित बुद्धिजीवी समाज का अबतक का सबसे बड़ा वीभत्स स्वरूप है। जख्मी का चेहरा यदि पहचान में न आये तो लोग लाइक और शेयर की लालच में अपने सगे सम्बन्धियों के साथ भी यही किस्सा दुहरायेंगे। अपना भोजन भूखे को सौंपने की दूसरों के दर्द को अपना दर्द महसूस करने की तथा मूक व लाचार जीवों के प्रति दया दिखाने की साधु सन्तों तथा पीर फकीरों की सनातन परम्परा धूल धूसरित हो रही हैं। जिन लोगों ने अपने माता पिता बड़े बुजुर्ग अथवा आतिथ्य के सम्मान का सलीका तक नही सीखा वही लोग धर्म की रक्षा की थोथी दलीलें देते फिर रहे है। आश्चर्य तो तब होता है जब हम वैसे ही अमर्यादित चरित्र के लोगों को अपना मार्गदर्शक बनाने की भूल कर बैठते हैं। क्या सचमुच हम अपनी परंपरा भूल गए। आत्ममंथन अवश्य करें।
पत्रकारिता से ताल्लुक रखने की वजह से इस तरह की हिंसा को बढ़ावा देने वाले लोगों के अलावा पीड़ित पक्ष की भी दलीलों और मौके पर की जा रही प्रशासनिक पहल से रूबरू होने का हमें भी अक्सर अवसर मिलता है। इन घटनाओं से प्राप्त अनुभव का सार यह होता है कि जिन्हें धर्म का एबीसीडी तक मालूम नही अमूमन वही अपने धर्म के झण्डा बरदार हुआ करते हैं। उनका उद्देश्य धर्म की रक्षा कतई नही होती सिर्फ और सिर्फ पाखण्ड होता है। कभी कभी तो बड़े नेताओं व प्रशासनिक पदाधिकरियों का भी इन्हें समर्थन व सहयोग मिलता दिखता है।हंगामा खड़ा कर अपने चेहरे को चमकाने की उनकी कुत्सित चाल को भोले भाले धर्मभीरु खासकर युवा वर्ग परख नही पाते और उनके झांसे में आकर ऐसा कृत्य कर डालते हैं जिसे याद कर कर के उन्हें जीवन भर पछताना पड़ता है। सीधी सी बात है जिसे अपने धर्म प्यारा है वह दूसरों को सुधारने के बदले अपने धर्म में आ रही विकृति अथवा असमानताओं को दूर करने का प्रयास करने में रुचि क्यों नही लेता। ऐसा करने से किसने उसे रोका है। कथित धर्म युद्ध के मामलों में नेतृत्व वही करते हैं जिन्हें वेद पुराण गीता रामायण कुरान बाइविल आदि धर्मग्रन्थों से कोई वास्ता नही होता। धर्म के नाम पर लोगों में उत्तेजना भरने वाले तथाकथित नेता के आचरण उसकी दिनचर्या तथा उसके चरित्र का मूल्यांकन करने के बाद ही आंदोलनों में शिरकत करनी चाहिए। देश में धर्म के नाम पर हो रही हिंसा अथवा मॉबलीचिंग की समस्या के निदान का यह सबसे सरल उपाय है। इसके प्रयोग से आपके अपनों की जान भी बच जाएगी तथा उनका भविष्य भी तबाह होने से वंचित रह जाएगा। अतएव धर्म व समुदाय पर हो रहे वाह्य आघात से बचाव के लिए प्रतिरोध के बजाय स्वधर्म की सबलता के लिए आत्म केंद्रित होकर पुनर्मूल्यांकन किया जाना ज्यादा जरूरी है।




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