गुरु पूर्णिमा पर विशेष : उपनिषदों के अनुसार गुरु वही है जो अपने शिष्य को अपने निज स्वरूप की प्राप्ति करा दे-गोविन्द जी महाराज
तरैया।27.07.2018
ठाकुरबाड़ी मंदिर परिसर स्थित पुस्तकालय भवन कक्ष में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।जिसमें श्री कृष्ण प्रणामी धर्म श्री निजानंद सम्प्रदाय के संत गोविंद जी महाराज ने कहा कि यह सम्पूर्ण प्रकृति अंधकारमय है और सच्चिदानंद परब्रह्म अक्षरातीत पुरुषोत्तम इस माया अंधकार तथा नारायणी सृष्टि से परे अविनाशी अक्षरब्रह्म और अक्षरब्रह्म से भी परे अखण्ड मण्डल परमधाम जो दिव्य प्रकाश युक्त है उस दिव्य परमधाम में परब्रह्म अपनी नित्य आत्माओ के साथ नित्य लीला विहार करते हैं और वही सभी आत्माओ का निजधाम परमधाम है जहाँ पहुँच कर आत्माये अपने निजधाम परमधाम तथा निजस्वरूप को प्राप्त हो जाती हैं ।जिसे शाश्वत मुक्ति कहा जाता हैं ।उपनिषदों के अनुसार गुरु वही है जो अपने शिष्य को अपने निज स्वरूप की प्राप्ति करा दे।इसके विपरीत जो गुरु अपने शिष्यों का विश्वास पात्र होकर शिष्यो को असन्मार्ग दिखाता हैं वह तब तक कुम्भीपाक नरक में वास करता हैं जब तक सूर्य और चंद्रमा का वास रहता हैं जो गुरु परब्रह्म के ज्ञान से शून्य है उसे शिष्य बनाने या दीक्षा देने का अधिकार नही है।परब्रह्म को तत्व से जानने वाला तत्वज्ञानी गुरु अपने शिष्य को मायावी संसार और इसके स्वरूप सत,रज,तम ये तीनो गुण और साकार,निराकार ,प्रकृति ,पुरुष जो महाप्रलय में नष्ट हो जाते है इसलिए तत्व ज्ञानी गुरु इन सब से अतीत अक्षरातीत परब्रह्म को तारतम्य ज्ञान के द्वारा धारण करवाता है जिसको धारण करते ही वह भक्त रोग ,शोक,जन्म ,मृत्यु, काल,यम आदि से निर्भीक हो जाता हैं ।तारतम्य ज्ञान और अनन्य प्रेमलक्षणा भक्ति को धारण करने वाला गुरु और शिष्य दोनो संसार सागर से तर जाते हैं तारतम्य ज्ञानी गुरु का ज्ञान समुन्द्र के समान अथाह होता हैं जिसमे शील सम्पन्न शिष्य गोता लगाकर अपने समस्त अशुभ वासनाओ को जला देता है और गुरु चरणों मे बैठकर अपने स्वरूप का बोध कर लेता है क्योंकि गुरु के द्वारा ही ज्ञान और मुक्ति सम्भव है।अतः चौरासी लाख योनियों में एक मनुष्य योनि ही ऐसा हैं जो तत्व ज्ञान धारण कर अपने स्वरूप की पहचान कर सकता हैं और अपने स्वरूप को पहचान कर उसमें स्तिथ हो जाना मोक्ष हैं इसलिये अपने निजस्वरूप को जानने वाले शिष्य को तंत्र-मंत्र ,जादू टोना,बिभिन्न प्रकार की पूजा पद्धतियों से ऊपर उठकर अपने स्वरूप की पहचान करना चाहिए। इसलिए भगवान को प्राप्त करने के लिए गुरु रूपी प्रकाश की परम् आवश्यकता है




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