
मनोज कुमार सिंह/छपरा।
पिछले कुछ महीनों से लिंक व यू ट्यूब चैनलों पर खबरों का प्रचलन काफी तेजी से बढ़ा है। खास कर लिंक खबरों के प्रति आम पाठकों के बढ़ते रुझान को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इनका प्रचलन कुछ दिनों में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पीछे छोड़ आगे निकल जायेगा। पाठकों के बीच बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए हमें लिंक खबरों को स्तरीय बनाने की दिशा में कुछ खास पहल करने की जरूरत है।
पत्रकार और पत्रकारिता समाज के प्रबुद्ध व जागरूक लोगों के समूह के रूप में जाना जाता रहा है। खबरों में तथ्यों की ढंग से अभिव्यक्ति, शब्दार्थ एवं भाषा का ज्ञान, व्याकरण की ठोस जानकारी एक पत्रकार को होनी हीं चाहिए। फास्ट न्यूज परोसने के चक्कर मे पाठक, क्षेत्र व समाज के ऊपर खबर के पड़ने वाले असर का भी भान एक पत्रकार होनी चाहिए। यदि ऐसा नही है तो खुद को पत्रकार कहकर पत्रकारिता को बदनाम करने से परहेज करें। सुषुप्त समाज को जाग्रत करने तथा मदमस्त सत्ता को लगाम लगाने की महती जिम्मेवारी पत्रकारों की होती हैं। भाव, भाषा और व्याकरण के अभाव में हम सही पत्रकारिता नही कर सकते। जिसकी मनोस्थिति उलझन में हो वह किसी और की समस्या का समाधान कैसे कर सकता है। भाव, भाषा और व्याकरण की समझ रखने वालों के लिए हीं पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग पत्रकार संगठन करते रहे हैं।
अक्षर से शब्द का निर्माण होता है तथा एक हीं शब्द के कई अर्थ उभरकर सामने आते हैं। शब्दों को जोड़कर वाक्य का निर्माण होता है। अक्षर से लेकर वाक्य तक को हमें भाव, भाषा तथा व्याकरण की कसौटी पर कसना होता है। ततपश्चात छह ककार को समेट कर खबर का इंट्रो (भूमिका) बनाना पड़ता है। खबर का शीर्षक पाठक के मन में उत्सुकता उत्पन्न करता है तथा खबर का इंट्रो पूरी खबर के भाव का अहसास कराता है। पूरी खबर पढ़ने के बाद पाठक की जिज्ञासा पूरी होती है। इन सबके अलावा एक पत्रकार को अपने बैनर के निर्देशों का पालन करना तथा अपने कार्य क्षेत्र से जुड़े पाठकों को संतुष्ट करने तक की बड़ी जिम्मेवारी होती है। प्रत्येक पत्रकार कम से कम हजारों अथवा लाखों पाठकों की उम्मीद की किरण होता है तथा उनके क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।लिंक व यू ट्यूब चैनल संचालित करने वाले पत्रकार साथी उपरोक्त बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपना टीआरपी बढ़ाने एवम वैध-अवैध तरीके से आमदनी बढ़ाने में व्यस्त दिख रहे हैं। लिंक खबर बनाने वाले ज्यादातर पत्रकार नैसिखिये हैं। उनकी लेखनी में भाव, भाषा और व्याकरण का घोर अभाव देखा जा रहा है। पाठक वर्ग को पल- पल की खबरों से अवगत कराना आपकी सक्रियता दर्शाता जरूर है परंतु आपकी आधी अधूरी जानकारी कभी-कभी अर्थ का अनर्थ कर देती है। वैसी स्थिति में आपको पाठकों का कोपभाजन भी बनना पड़ता है। इससे पत्रकार की गरिमा भी गिरती है। पंचायत चुनाव का दौर चल रहा है। इस क्रम में प्रत्यासी विशेष को लाभ पहुंचाने का झांसा देकर ठगी करना अपराध की श्रेणी में आता है। खबर तो आखिर खबर है। खबर के नाम पर लेन-देन कहीं से भी उचित नही है। हाँ बैनर-पोस्टर तथा गीत आदि का बीडीओ बनाकर प्रसारित करने के नाम पर विज्ञापन खर्च लिया जा सकता है। कई प्रत्यासी भी हैं जिनको खबर व विज्ञापन में अंतर समझ में नही आता है। उन्हें बताया जाना चाहिए। अन्यथा प्रत्यासी को जिस दिन अंतर समझ में आएगा उस दिन शर्मसार होना पड़ेगा।
लेखक व पत्रकार मनोज कुमार सिंह, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी है।




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