स्वतंत्रता समानता व सर्व पंथ समभाव के प्रेरणा स्रोत थे,वीर बाबू कुंवर सिंह
,🚩विजय दिवस पर विशेष🇦🇱
*परमार अखिलेश *
अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में संयुक्त प्रांत, बिहार से लेकर संपूर्ण उत्तर भारत के अग्रणी नेता बाबू कुंवर सिंह स्वतंत्रता समानता व सर्व पंथ समभाव के प्रेरणास्रोत थे।  बहरहाल, अगस्त क्रांति से लेकर जेपी के संपूर्ण क्रांति की भूमि को अपने रक्त से सींचने वाले भोजपुरिया रण बब्बर के चरण चिन्ह प्रेरक रहे हैं।
अगस्त क्रांति के प्रेरणा स्रोत– सम्पूर्ण सारण क्षेत्र व भोजपुरिया अंचलों में बाबू साहब प्रेरणा स्रोत रहे। बहुरिया अमनौर सवालिया दूबे से लेकर बिहार के प्रथम शहीद बाबू रामदेवी सिंह बूढ़े रणबाघ की शौर्य गाथाओं से प्रभावित थे। सरदार भगतसिंह की”हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी शाखा खुलना सारण के एरिया कमांडर बाबू रामदेनी सिंह , वैशाली के एरिया कमांडर योगेंद्र शुक्ल के मनोनयन में मल्ल क्रीड़ा का अनायास आयोजन व सरदार को भोजपुरिया मरदाही का एहसास कराने में बाबू साहब की प्रेरणा थी। भोजपुरी जनपदों में लोक धुन की धमार——
‘बाबु के अस्सी ए सरिस के उमिरिया हो ना।
ऐ बाबु काटि लिहलन मुदइअन के मुरिया हो ना।’ जब जवान सुनते थे तो उनके शिराओं में बह रहा लहु खौलने लगता था। बहरहाल, ४मई१९३२को बिहार में प्रथम शहादत बाबू राम देनी सिंह ने​ दी फिर अगस्त क्रांति में नयागांव के राजेंद्र प्रसाद सिंह , सोनपुर के महेश्वर सिंह मलखाचक दिघवारा के वीर नारायण सिंह हरिनंदन प्रसाद, ठाकुर सीताराम सिंह, ठाकुर यदुनंदन सिंह,सहबीरसाह शहीद हुए।
सारण के हरिहर क्षेत्र मेला में१८५७संग्राम का बीजारोपण हुआ— महाकवि आरसी प्रसाद सिंह के हिंदी प्रवंधकाव्य’वीर कुंवर सिंह’के अनुसार”१८५६में हरिहर क्षेत्र मेला में राजे , ताल्लुकदारों जमींदारों की एक विशेष गुप्त बैठक वीर कुंवर सिंह की अध्यक्षता में हुई और क्रांति की मशाल जलाई गई। जगदीश पुराधीश्वर बाबू साहब ने उत्तम नस्ल के घोड़े खरीदे खगडा बलहोतरा सिंधबाज भुटिया अरबिया घोड़े को लेकर जगदीश पुर बापस हुए। सेनानियों की भर्ती व गुरिल्ला प्रशिक्षण गंगा व सोन के बीच दियारा क्षेत्र संबलपुर से लेकर सिताब दियारा तक जारी रहा।
वीर कुंवर सिंह की गौरवशाली वंश परंपरा—सम्राट विक्रमादित्य व मालवाधिपति भोज के गौरवशाली वंश परंपरा के वाहक वंश ज थे बाबू कुंवर सिंह। वाक् पति भोजराज परमार ने चेदि शासकों हराकर भोजपुर राजधानी बनायी। भोज नाम से मालवा नरेश के क्षत्रप शासन करने लगे। उसी राजा भोज के २५वीं पीढ़ी में बाबू कुंवर सिंह आए। परमार वंश के क्षत्रप उज्जैन से आए थे इसलिए ये उज्जैन कहलाए। जगदीश पुराधीश्वर बाबू साहब जादा सिंह वर्मा रानी पंचरत्ना के जेष्ठ पुत्र रत्न के रूप में १७७७में अवतरित कुंवर सिंह १८२६में सिंहासनारूढ हुए। कुशल शासन प्रबंधन व लोक कल्याणकारी कार्यक्रमों से  राजा की ख्याति बढने लगी।इधर अंग्रेजी हुकूमत ने राजस्व बढ़ाने का तुगलकी फरमान जारी कर दी। बूढ़ा शेर दहाड़ उठा आवाज़ दानापुर के हिंदुस्तानी सिपाहियों के कानों तक पहुंच गयी। राजा कुंवर सिंह राजकुमार अमरसिंह रणदलनसिंह तुलसी सिंह पीर अली मैकू मल्लाह लच्छू पासवान दिघवारा के झमन तुरहा, मलखाचक के रामगोबिंद सिंह ककवा  ताखा सिंह दिराखा सिंह जालिम सिंह जुलुम सिंह जुझारसिंह जैसे सेनानियों के साथ दानापुर पल्टन के बागी नायक रणजीत सिंह ने बाबू साहब के नेतृत्व में युद्ध का बिगुल बजा दिया।२६ जुलाई १८५७को शपथ ग्रहण के बाद २७जुलाई १८५७को वीर कुंवर सिंह ने आरा पर अधिकार कर लिया। २९ व३० जुलाई १८५७को आजमगढ़ व गाजीपुर पर विजय ध्वज फहराने लगा। १७मार्च १८५८ को कर्नल डेस तथा १७अप्रैल१८५८को  ब्रिगेडियर डगलस को नाहर कुंवर सिंह ने पछाड़ा।
बलिया शिव पुर घाट से गंगा पार करने के क्रम में कर्नल लुगार्ड की गोली बड़े ठाकुर की बायीं भुजा को जख्मी कर दी तत्क्षण वीर कुंवर सिंह ने अपनी भुजा शरीर से अलग कर मां गंगा को अर्पित कर दी। जगदीश पुर किले में वापसी के बाद २३अप्रैल१८५८ को कुमार अमरसिंह बनाम कैप्टन एवं ग्रैंड के संग्राम में वीर कुंवर सिंह विजयी रहे।  २६अप्रैल१८५८को अपने अनुज कुमार अमरसिंह को तख्त ताज सौंपकर सिंह सदा के लिए शिवलोक वासी होए। मुगलों से लड़ने वाले पुरखे राजा दलपति सिंह परमार, राजा प्रताप सिंह परमार की कड़ी को कायम रखने वाले बाबा कुंवर सिंह शिव लोक से संघर्ष की प्रेरणा दे रहे हैं। इतिहासकार विलियम होम्स के शब्दों में” फिरंगी सौभाग्यशाली थे कि क्रांति के समय कुंवर सिंह ८०वर्ष के हो चुके थे।यदि १८५७में वे ४०वर्ष के होते तो नजारा कुछ और होता। वह बूढ़ा राजपूत ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध आन से लड़ा और शान से मरा।