पटना(अनूप नारायण सिंह):
रेणु जी अपनी कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ के सिलसिले में पहली बार बंबई गए। फ़िल्म बना रहे गीतकार शैलेंद्र ने उनसे पूछा, ‘अच्छा! कहानी लिखते समय आपके सामने हीराबाई की कोई तस्वीर तो ज़रूर होगी। अब जबकि फ़िल्म की बात हो रही है, तो फ़िल्म इंडस्ट्री में आपको मूरत से कोई सूरत मिलती-जुलती नज़र आती है? यांनी आप किसको इस भूमिका के लिए…।’
रेणु ने हँसकर जवाब दिया, ‘भाई! हम लोग कननबाला, उमाशशि, यमुना, देविका रानी, सुलोचना और नसीम वगैरह के युग में सिनेमा देखा करते थे। अब तो सब चेहरे एक ही साँचे में ढले-से लगते हैं। किसका क्या नाम है, याद ही नहीं रहता।’

शैलेंद्र हँसे और कहा : यह तो टालने वाली बात हुई।
आखिरकार कुछ देर बाद रेणु ने अपनी राय जाहिर करते हुए कहा, ‘वह एक “प्यासा” में माला सिन्हा के साथ कोई लड़की थी न?’
शैलेंद्र ने बासु भट्टाचार्य की ओर देखा और बासु के मुँह से एक किलकारी के साथ निकला ‘स्साला!’ रेणु याद करते हैं कि ‘मैं जानता था कि यह कोई गाली नहीं। बंगाली विद्यार्थी जब बहुत खुश होते हैं तो उनके मुँह से यह शब्द अनायास ही निकल पड़ता है?’ फिर वे झेंप गए कि कहीं उन्होंने गलत या ‘मिसफिट’ चेहरे की बात तो नहीं की।

रेणु की दुविधा को देखकर शैलेंद्र ने कहा, ‘हमारे मन में भी उसी की सूरत है। आप क्या सचमुच उसका नाम नहीं जानते? वह वहीदा रहमान है।’
इसके दूसरे-तीसरे दिन ही शैलेंद्र वहीदा रहमान से मिले और उन्हें ‘तीसरी कसम’ की कहानी सुनाई। कहानी वहीदा रहमान को भी पसंद आई और उन्होंने हीराबाई के किरदार के लिए अपनी मंजूरी दे दी। लौटकर शैलेंद्र ने रेणु से कहा, ‘साहब! हो गई आपके मन की हीराबाई। परसों हम एग्रीमेंट पर दस्तख़त कराने जाएंगे। कहानी सुनकर उनकी आँखें छलछला आईं।