महिला दिवस पर विशेष : धरा की धरणी हैं सोना कुंवर

छपरा : धरा की धरणी है अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सोना कुंवर। एक ऐसी नारी जिसने अपने जीवन में बार मुश्किल का सामना किया और आज भी खड़ी है इस धरा पर। उनका कार्य फेसबुक के लिए नहीं है।

सन 1965 में जन्मी सोना की शादी सारण जिला कें जलालपुर प्रखंड अंतर्गत बंगरा के एक अतिनिर्धन व्यक्ति लालबाबू प्रसाद से 1985 में हुई। निरक्षर सोना और लालबाबू का वैवाहिक जीवन मात्र 10 वर्ष चला और 1995 में एक दुर्घटना में लालबाबू की मृत्यु हो गई। एक 30 वर्ष की महिला के जीवन में इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता था। लेकिन सोना तो सोना थी, टूटना उसे मंज़ूर नहीं था।

मजदूरी करके अपने बच्चों का लालन पोषण करने लगी। बच्चे बड़े हुये तो सबसे बड़े बेटे धर्मेन्द्र की शादी 2010 में उसने कर दी। पतोहू पूजा के आने से एक बार फिर से लगा कि घर में खुशियां आ गई।

लेकिन कुदरत को एक बार फिर से वही कहानी दुहरानी थी, वर्ष 2017 में एक विद्युत दुर्घटना में धर्मेन्द्र की मौत हो गयी। वह ऐसी मौत थी जिससे पूरे इलाके में सन्नाटा हो गया। सोना के जीवन में फिर से दुःख ने अपनी गहरी पैठ बना ली।

एक विधवा की बहू भी विधवा हो गई…लेकिन वह टूटने वाली नहीं थी। समाज के सहयोग से सरकार से मुआवजा राशि मिली। सोना के मन में कुछ दूसरा चल रहा था। उसने वर्ष 2018 में अपनी विधवा बहु का विवाह छोटे लड़के से करा दी। यह समाज के लिए एक सन्देश भी था।और आज भी मजदूरी करते हुये उसने अपना घर बना लिया है। वह छिपी हुई प्रेरणास्त्रोत है समाज के लिए। उनका कार्य समाज को दिखाने के लिए नहीं है, अपने आप को सशक्त बनाने के लिए है। अगर हर महिला ऐसी वीरांगना हो जाये तो किसी भी महिला दिवस को मनाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

साभार : माँ यूथ ऑर्गनाइजेशन , बंगरा कें fb पेज वाल से