
👏गांधी को महात्मा की उपाधि दिलाने वाले चंपारण सत्याग्रह के 100 साल आज पूरा 👏
•चंपारण सत्याग्रह के महत्ता और इसके प्रभाव विषय पे विवेक रंजन के साथ विवेक शंकर की खास बातचीत दैनिक खोज ख़बर के साथ
चंपारण बिहार के उत्तर -पश्चिम में स्थित हैं। धान की भारी उपज होने के वजह से अंग्रेजी शासन के दौरान कई बार इसे चावल का कटोरा भी कहा जाता था। चंपारण के कई इलाकों में जल जमाव की समस्या रहती थी।
नील की खेती के लिए इस प्रकार का खुश्क वातावरण वरदान था और इस वजह से यहाँ के किसानों से जबरदस्ती नील की खेती भी करवाई जाती थी।
चंपारण में नील की खेती के लिए दो अलग अलग व्यवस्थायें प्रचलित थीं। जेरैत और असामीदार। जेरैत डिपार्टमेंटल खेती होती थी, निजी देख-रेख में। असामीदार किसान किरायेदार की तरह होता था जहाँ उसे नील की खेती ही करनी होती थी। भू-भाग का एक चौथाई हिस्सा जेरैत के लिए आवंटित था तथा तीन चौथाई असामीदारी के लिए। इसी कारण इस व्ययवस्था को “तिनहथिया” भी कहते थे। असामीदार किसान जेरैत खेतों में मज़दूर का काम भी करते थे या यूं कहिए बेगारी करते थे।
उन्नीसवी सदी के उत्तरार्ध में 46000 एकड़ से ज्यादा में नील की खेती होती थी। बेहतरीन जर्मन नील से प्रतिस्पर्धा के वजह से 1915 तक नील-रोपण तकरीबन 8200 एकड़ तक ही सीमित रह गयी थी। प्रथम विश्व युद्ध के वजह अंग्रेजी हुकूमत नें जर्मनी से नील का आयात बंद कर दिया था। इस वजह से नील की माँग फिर बढ़ने लगी और चम्पारण नील की खेती के लिहाज से फिर से प्रासांगिक होने लगा। सरकार और जमीनदारों ने नील उत्पाद क्षेत्रफल विस्तृत करना आरंभ कर दिया।
इसके अलावा शाषन व्यवस्था और ज़मींदारों ने एक “तीन कठिआ ” सिस्टम लगा रखा था जिसमें एक बीघे में तीन कट्ठे नील की खेती आरक्षित होते थे।
एक चम्पारणी बीघा (जो तकरीबन 0.4 एकड़ के सामन होता है) के अंदर 20 कट्ठे होते थे। फ़लस्वरुप इसका नाम “तीनकठिआ” पड़ा। 1916 के पहले इन ज़मीनों पर पाँच कट्ठे आरक्षित होते थे नील खेती के लिए। फैक्ट्रियों में फसल देने के दौरान भी खेतिहरों पर अनेक तरह के कर लगते थे जिसमें बपाही-पुताही, मरवच, और सगौरा प्रमुख थे।
इन सब करों के बावजूद फैक्ट्रियाँ फसलों का गलत मूल्यांकन करती थी और किसानों को फसल अदायगी कभी समय पर नहीं होता था। हालांकि अगर देखे तो फैक्ट्रियों से किसानों की अदायगी की स्तिथि में कोई विशेष बदलाव आज तक नहीं आया है।
इन परिस्तिथियों में भी नील कंपनियों के बही खाता को सुधारने के लिए अंग्रेजी हुकूमत नें नए करों को लगाने और पुराने करों को बढ़ाने की इज़ाज़त दे दी।
उस वक़्त ये कम्पनियाँ किसानों से जबरन वसूली के लिए “खलीफ़ा” (आज भी चम्पारण के कुछ इलाकों मे पहलवान को खलीफ़ा ही बोलते है) रखा करती थीं। सन 1915 के दौरान खलीफाओं के साथ साथ आकाल भी किसानो के दरवाजे पर दस्तक देने लगी थी।
1915 में पिपरा में नील की खेती करने वालों किसानों ने अनुबंधित मज़दूरों के साथ मिलकर इस नाइंसाफी का विरोध किया। यह अहिंसा पर आधारित एक असहयोग था।
खलीफाओं के छिट पुट दमन पर भी उनका असहयोग हिंसा से दूर रहा। पेट की आग ने आनन-फानन में इस असहाय असहयोग आंदोलन को निबटा जरूर दिया पर किसानों-मज़दूरों को एक रास्ता दिख चुका था।
1917 में पुनः तुरकौलिया में एक अहिंसक असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। यह आंदोलन एक बड़े पैमाने पर था और कुछ लंबा भी खिंचा। स्व-निर्वाह के कारण इसका टूटना भी लाजिमी था और वही हुआ।
हाँ दोनों आंदोलन के दौरान किसानो मज़दूरों पर दमन होने के बावजूद हिंसा नहीं हुई । शायद इतिहास नें कभी इन करुणामय मगर अद्वितीय परस्थितियों को महातम के निगाह से नहीं देखा मगर यह एक बड़ी घटना थी जो महात्मा गाँधी के अहिंसा के विचारों से पंक्तिबद्ध थी और शायद इसी नें महात्मा गाँधी को चंपारण आने के लिए प्रेरित भी किया।
दिसंबर 1916 में लखनऊ में आयोजित 31 वें कांग्रेस अधिवेशन में राज कुमार शुक्ल कई कांग्रेसी नेताओं से मिले। उन्होंने सभी बड़े नेताओं को चम्पारण के नील किसानों-मज़दूरों की बदहाली और नील कंपनियों के दलाली के बारे में अवगत कराया ताकि यह मुद्दा कॉन्स्टीटूएंट असेंबली में उठे ।
उन्होंने गाँधीजी को भी इस मसले पर विस्तार से बताया। पूरी तन्मयता से सुनने के बाद भी महात्मा गाँधी ने विशेष रुचि नहीं दिखायी। बिहार में कांग्रेस की तुल्नात्मक पकड़ और फिर चंपारण जैसे पिछड़े इलाके में सविनय आंदोलन की पृष्ट्भूमि महात्मा के विशिष्ट मानसिक पटल पर शायद जगह नहीं बना पा रही थी। राज कुमार शुक्ल स्वयं एक जमींदार थे और उनके मुख से किसानों मज़दूरों की बदहाली का विवरण ने गाँधीजी को प्रभावित किया था।
अंततः जब शुक्ल जी ने पिपरा और तुरकौलिया में किसानों-मज़दूरों द्वारा किये गए अहिंसक असहयोग के बारे में बताया तो महात्मा गाँधी तुरंत राजी हो गए चम्पारण चलने के लिए। शायद अहिंसक असहयोग के उदाहरण के प्रस्तुति का वह अद्धभुत संयोग था की जिसकी परिकल्पना महात्मा अपने ज़हन में कर रहे थे।
1917 के आरम्भ में गाँधीजी कलकत्ता गए पर संवाद के आभाव में उनका राज कुमार शुक्ल जी से संपर्क नहीं हो पाया। राज कुमार शुक्ल नें प्रयास ज़ारी रखा। ख़ैर, अप्रैल में महात्मा फिर कलकत्ता आए और 15 अप्रैल को चम्पारण के जिला मुख्यालय मोतीहारी पहुँचे। उनके आवभगत के लिए आचार्य कृपलानी ( उस वक़्त मुज़्ज़फ़्फ़रपुर में आचार्य के पद पर स्थापित थे ),
महादेव देसाई , दीन बंधु, सी एफ एंड्रयू, एच एस पोलॉक, डॉ राजेन्द्र प्रसाद , बृजकिशोर प्रसाद , अनुग्रह नारायण सिंह , रामश्री देव त्रिवेदी , धरणीधर प्रसाद तथा बिहार के अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद थे।
महात्मा गाँधी के चंपारण आने के बाद एक नए इतिहास की कायावत का लेखा तैयार होने लगी।
15 अप्रैल 1917 के दिन गांधी मोतिहारी पहुंचे थे. मोतिहारी आने से पहले न तो ज़िले का नाम ठीक से जानते थे न वहां पहुंचने का रास्ता मालूम था, न उन्होंने कभी नील का पौधा देखा था.
18 अप्रैल को जब गांधी मोतिहारी कोर्ट की तरफ जा रहे थे, ये बताने कि वे ज़िला छोड़ने की




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