क्या क़तर और ओमान ने सऊदी अरब की हवा निकालने का मन बना लिया है ?

अब्दुल मुतलिब रज़ा 
क़तर ने जब से ईरान को इस्लामी शक्ति बताया है, सऊदी अरब अपने इस पड़ोसी देश के ख़िलाफ़ लगातार माहौल बना रहा है और इसे सबक़ सिखाने के लिए नई नई चालें चल रहा है। सऊदी अरब फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के साथ हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाता रहा है और उसे कभी भी यह बात पसंद नहीं है कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद का कोई सदस्य देश उसके किसी फ़ैसले से असहमति जताए।
यही कारण है कि यमन, सीरिया और इराक़ में फ़ार्स खाड़ी के अरब देश सऊदी अरब के दबाव में उसकी सनक का समर्थन करते रहे हैं और न चाहते हुए भी यमन में अपने ही भाई बंधुओं पर बमों की बारिश कर रहे हैं। सीरिया में तकफ़ीरी आतंकवाद के समर्थन में क़तर ने बढ़ चढ़कर सऊदी अरब का साथ दिया और अरबों डॉलर बशार असद की सरकार को गिराने के उद्देश्य से पानी की तरह बहा दिए और लाखों लोगों की बलि चढ़ा दी।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि क़तर अब सऊदी अरब से अपनी राह अलग करने के लिए हाथ पैर मार रहा है और इसमें उसका साथ फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद का एक दूसरा सदस्य दे सकता है। ओमान कि जो पहले भी सऊदी अरब की विदेश नीति और तकफ़ीरी आतंकवाद को बढ़ावा देने का समर्थक नहीं रहा है, क़तर के लिए एक बड़ा सहारा बन सकता है।
पश्चिमी मीडिया में भी इस तरह की रिपोर्टें देखने को मिल रही हैं कि क़तर और ओमान फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद से बाहर निकल सकते हैं। क़तर और ओमान अगर फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद से बाहर निकलने का एलान कर देते हैं, तो सऊदी अरब की तकफ़ीरी आतंकवाद को बढ़ावा देने और पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की मांग का गला घोटने पर आधारित नीतियों की काफ़ी हद तक हवा निकल जाएगी, इसलिए कि उसके बाद संयुक्त अरब इमारात को भी सऊदी दबाव से निकलने में आसानी हो जाएगी।