
🔴श्रावणी पर्व पर किए जाने वाले रक्षा विधान में वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाने वाला कलावा मात्र तीन धागों का समूह ही नहीं है अपितु इस में आत्मरक्षा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के तीनों सूत्र संकल्पबद्ध होते हैं।
हम अपनी प्राचीन अखंड विरासत का स्मरण कर वर्तमान में श्रावणी पर्व पर यह संकल्प लें कि भारत की सार्वभौमिक, विश्व बंधुत्व की भावना हमें एक सूत्र में बंधने की प्रेरणा प्रदान करती रहे तथा राष्ट्र में कोई भी विघटनकारी ताकत अपना सिर न उठा सके।
इस संकल्प के बाद वेद मंत्रों से अभिमंत्रित यज्ञोपवीत धारण कर हाथ की कलाई में रक्षासूत्र बांधा जाता है।
इस शुभ पर्व पर बहनें अपने भाई से यह वचन चाहती हैं कि आने वाले दिनों में किसी बहन के तन से वस्त्र न खींचा जाए फिर कोई बहन दहेज के लिए मारी ना जाए, फिर किसी बहन का अपहरण ना हो, फिर किसी बहन के चेहरे पर तेजाब न फेंका जाए।
और … और फिर कोई बहन खाप के फैसले से भाई के हाथों जलाई ना जाए।
यह त्योहार तभी सही मायनों में खूबसूरत होगा जब बहन का सम्मान और भाई का चरित्र दोनों कायम रहे। यह रेशमी धागा सिर्फ धागा नहीं है। राखी की इस महीन डोरी में विश्वास, सहारा और प्यार गुंफित हैं और कलाई पर बँधकर यह डोरी प्रतिदान में भी यही तीन अनुभूतियाँ चाहती हैं।
पैसा, उपहार, आभूषण, कपड़े तो कभी भी, किसी भी समय लिए-दिए जा सकते हैं लेकिन इन तीन मनोभावों के लेन-देन का तो यही एक पर्व है – रक्षाबंधन!
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इनपुट : आर के लालवानी
साभार : परमार डाॅट काॅम : सीवान ( बिहार )




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