भक्ति की जुआ में हार भी जीत समान-सदन बिहारी
✍देवेंद्र कु सिंह की रिपोर्ट ⏩रसूलपुर /एकमा (सारण): प्रभु की भक्ति में लीन भक्त तन,मन,धन से अपने आपको पूर्णतः समर्पित कर देता है। ऐसे भक्तों के लिए भक्ति रूपी जुए की हार में भी जीत का हीं आनन्द होता है।
उक्त बातें रसूलपुर पंचायत के धानाडीह गाँव स्थित माँ सती स्थान के प्रांगण में आयोजित सात द्विवसीय श्री रामचरितमानस ज्ञान महायज्ञ में तीसरे दिन गाजीपुर से पधारे आचार्य सदन बिहारी चतुर्वेदी उर्फ मानस जी मराल ने प्रबचन के दौरान कही।सैकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रोताओं को भक्ति रस में सराबोर कराते उन्होंने कहा कि आस्था और विश्वास नदी के दो किनारों की तरह होता है। जिसके बीच भक्ति रूपी जल का बहाव होता है।विश्वास समाप्त होते हीं भक्ति भी मृत हो जाती है।
“शिव पार्वती ” की विवेचना करते हुए आचार्य बिहारी ने कहा कि पार्वती ने रामावतार पर अविश्वास किया।जिसका फल था कि भगवान शिव को सती से मोह भंग करना पड़ा।
इसलिए भक्ति रूपी सागर में डूबकी लगाने के लिए आस्था और विश्वास रूपी जल की आवश्यकता होती है।ऐसा हमारे शास्त्रों में भी वर्णित है।





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