सोनपुर । हम, अकसर बाढ़, सुखार या वायु प्रदूषण की चर्चा करते हैं। अब समय आ गया है कि हम ग्लोबल वॉर्मिंग और हीट स्ट्रेस को भी अपनी चर्चाओं में नियमित सम्मिलित करें।उक्त बातें पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ दीपक कुमार ने बढ़ते गर्मी व तापमान को लेकर उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता तापमान । अभी तो गर्मियां शुरू ही हुई हैं और पूरे प्रदेश का पारा चढ़ चुका है। कई शहरों में पहले ही 40 डिग्री को पार कर चुका है। हीट स्ट्रेस के
कारण केवल बढ़ते तापमान की ही समस्या नहीं है । बल्कि उमस की एक बड़ी दिक्कत है जब तापमान और उमस का मिला-जुला असर हमारे शरीर के 37 डिग्री तापमान से अधिक हो जाता है तो हम हीट स्ट्रेस का अनुभव करने लगते हैं।
“बीती सदी में भारत का सालाना औसत तापमान 0.7 डिग्री बंढ़ गया, है।, विगत, बीस सालों में, भारत ससे पहले के दो दशकों की तुलना में हीट वेव की संख्या लगभग ढाई गुना बढ़ गई है। शहदी क्षेत्र व ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 2 डिग्री अधिक गर्म है। इसकी मार गरीबो, किसानो पक्ष प्राणी एवं निसहाय पशु पर ज्यादा पड़ती है। हीट स्ट्रेंस के काल बीमारियां बढ़ती है और सेकड़ों लोग किडनी, लिवर और हार्ट सहित लगभ‌ग सभी महत्वपूर्ण अंगों पर असर पड़ता है। कलाईमेट चेंज और हीट स्ट्रेज के इसरे भी परिणाम है। उनका असर सामाजिक- अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। फसलें खराब होती हैं। मवेशियों एवं पशु पक्षियों भागकर जौ- नि सहाय है । लकई तरह की बिमारियों के शिकार होने लगते हैं।.पशु अप देना कम कर देती है। विशेषकर कृषि, पशुपान और निर्माण क्षेत्र में। भीषण गर्मी से. काम और आमदनी में कमी आती है। बिहार आज भी एक लैबर-इंटेंसिव राज्य है।
गर्मी में दुधारू पशुओं की देखभाल —
सवाल है कि क्या पशुओं पर भी गर्मी का असर पड़ता है ? अगर पड़ता है तो उसका क्या प्रभाव होता है —
मौसम का असर —हमारी जो देसी नशले के पशु है वह तो फिर भी कुछ हद तक बढ़े हुए तापमान में खुद को व्यवस्थित रखती है पर संकर नस्ल की पशुओं की हालत तो बहुत ही खराब हो जाती है । जहां तक भैसों की बात है तो यह भारतीय महाद्वीप में ही बहुतायत में पाए जाने के बावजूद गर्म मौसम के प्रति काफी संवेदनशील होती है । काली त्वचा होने से तथा त्वचा पर कुछ क्षवी ग्रंथियों की कमी हो भी भैसों को गर्मी में ज्यादा परेशानी होती है। इन जानवरों की गर्मियों मैं सही संतुलन नहीं रह पाता है । पशुओं के भोजन ग्रहण करने की क्षमता में भी ह्रास हो जाता है। पशुपालकों की दूध उत्पादन क्षमता काफी कम हो जाती है । * पशुशाला हमेशा पूरब पश्चिम दिशा में निर्मित होनी चाहिए, ताकि पशुओं को सीधे गर्म हवा से बचाया जा सके ।
* पशुओं के लिए स्वच्छ पीने योग्य पानी हमेशा उपलब्ध होना चाहिए।
* पशुओं को सुबह जल्दी और देर शाम को खिलाने की कोशिश करें
* यदि कोई पशु लू से प्रभावित हो गया हो तो तुरंत उसे स्थान पर ले जाकर शरीर पर ठंडा पानी छिड़के ।
सूखा क्षेत्र —सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पशुओं में बहुत सारे रोग के फैलने की संभावना रहती है ।
जिनमें प्रमुख है– गला घोट, लंगड़ा बुखार, एम्फिस्टमियोसिहा या छेरो ।
निःसहाय प्रणु पक्षियों के लिए अनुरोच :- आम लोगो से अनुरोध है कि नि:सहाय पशुओं पंक्षियों के लिए अपने घरों,छत पर दाना ,पानी जरूर रखे ।
बृक्ष , पेड़ के निचे रोड के किनारे पुराने बर्तन में स्वच्छ पशुओं पक्षियों को बचाया जा सकता है अगर संभव हो तो घर के आगे या वाउण्ट्री के बाहर एक नल जरूर लगाए ताकि आने, जाने वाले राहगीरों एवं निःसहाय को जल मिल सके । उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में कई राज्यों में एक हीट एक्शन प्लान पर काम हो रहे है।