दुर्योधन अभी मरा नही है, भीम को जगाइये
सारण के पत्रकार प्रभात किरण हिमांशु का आलेख
सारण एक बार फिर चर्चा में है. देश के लगभग सभी न्यूज चैनलों पर एकमा में हुई घटना को बड़े जोरशोर से दिखाया भी जा रहा है. नेताओं की प्रतिक्रिया, पक्ष- विपक्ष की जुगलबन्दी और आकर्षक आवाज में शब्दों से प्रहार करने वाले देश के ताजातरीन एंकर्स मानवीय संवेदना की ज्वलंत प्रस्तुति में सफल हो रहे हैं. अखबारों में रूटीन के अलावा कुछ संपादकीय भी आने वाले दिनों में निश्चित ही प्रिंटिंग मशीन की कुछ स्याही जरूर खर्च करेंगे. कुछ कार्रवाइयां होगी और कुछ कड़े फैसले भी लिये जाएंगे. वैसे बहुत कुछ हो भी रहा है. फ्लैक्स बनने शुरू हो गए हैं. काली पट्टियों की डिमांड भी बढ़ने लगी है. कुछ बैनर पर तो ‘विरोध प्रदर्शन की जगह ‘सामूहिक दुष्कर्म’ जैसे शब्दों ने प्रमुखता से लीड ले लिया है.
हालांकि यह जायज भी है. समाज में होने वाले नाजायज कार्यों का विरोध देश को अनेकों बार नयी राह दिखाने में सफल रहा है. वैसे सारण में हुई इस घटना (गैंगरेप) के कई एंगल है, ऐसी चर्चा दबी जुबान से है. अब यह दबी जुबान किसकी है और कहां से है यह कोई विशेष फर्क नही डालता. मूल मुद्दा दोषियों को सजा दिलाने और समाज मे फैल रहे संकीर्णताओं को दूर करने का है. सत्ता, सुशासन और उसके कुछ तथाकथित अंगुलीमाल भी इस घटना के एंगल में हैं या नही इसे लेकर भी दबी जुबान वाले ही अपनी राय बना रहे हैं. पर सच्चाई में संघर्ष और पीड़ा है यह उसे झेलने वाला ही बता सकता है.

बहरहाल अर्जुन अपने गांडीव और तीर से सामाजिक कुरीतियों के जड़ पर प्रहार कर नयी चेतना लायें. न्याय के लिये नाउम्मीद होते समाज को कोई कृष्ण फिर मिल जाये. देर किस बात की. दुर्योधन अभी मरा नही है और धृतराष्ट्र भी जिंदा है. भीम को जगाइये. यहां राजनीति भी है और धर्मयुद्ध के लिये निकले उस रथ को हनुमान का संरक्षण भी. जरूरत है तो साहस की. प्रभात का प्रयास तो कलम से क्रांति है.
(यह लेखक के अपने विचार हैं)