
✍रांची, खेलगांव से नवीन सिंह परमार की रिपोर्ट
💢रांची ( 01 अक्टूबर ) रांची के खेलगांव में पिछले दिनों आयोजित हुए लोकमंथन :2018 के तृतीय दिवस शनिवार 29 सितंबर को “व्यवस्थावलोकन” विषय पर केंद्रित परिचर्चा के दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए राजनीतिक विचारक सह राज्यसभा सदस्य डा. विनय सहस्रबुद्धे ने यथास्थिति के प्रति प्रेम को व्यवस्था अवलोकन और व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में एक बड़ी चुनौती बताया है।
श्री सहस्रबुद्धे ने कहा कि जो चल रहा है, अच्छा चल रहा है यह मानसिकता व्यवस्था परिवर्तन की एक बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि पहले चीजों का हम ठीक ढंग से आकलन करें और उसके बाद उस संदर्भ में अवलोकन कर चर्चा करें।
डा. विनय सहस्रबुद्धे ने व्यवस्था अवलोकन को असाधारण शब्द बताया। कहा, बहुत सोच समझ कर इसको यह कहा गया है। इसमें दो शब्द हैं- व्यवस्था और अवलोकन। मगर मैं मानता हूं कि व्यवस्था को समझने के पहले जरूरी है कि हम अवस्था को समझें। जब तक अवस्था ध्यान में नहीं आएगी तो उसके अंदर अंतरनिहित जो पैटर्न है जो कि व्यवस्था है वह समझ में नहीं आएगी। इसलिए अवस्था को समझ लेना, अवस्था का आकलन मैं मानता हूं कि व्यवस्था अवलोकन की एक प्री कंडीशन है। एक उसकी पूर्व शर्त है। उन्होंने कहा कि इसे अवलोकन कहा गया आकलन नहीं। क्योकि अवलोकन के बाद आकलन आता है। कोई चित्रकार चित्र खींचता है तो उसे कई बार देखता है, यह होता है अवलोकन और उस अवलोकन के बाद एक आकलन बन जाता है। कहा, मैं मानता हूं हमें अवलोकन के पहले आकलन भी करना चाहिए और व्यवस्था के पहले जो अवस्था है उसका भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है। उसके बारे में जब तक हमारी धारणाएं सही और स्पष्ट नहीं होंगी, व्यवस्था अवलोकन और उसके बाद व्यवस्था में परिवर्तन यह चीजें थोड़ी कठिन हो जाएंगी।
उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन या शायद विश्व के अन्य चिंतनों में भी चीजों को समझने में थोड़ा समय लगता है, ऐसा नहीं कि एकदम से दिमागमें ट्यूबलाइट जल गई। धीरे-धीर चीजों को समझ में हमें लेना पड़ता है तभी चीजें समझ में आने की स्थिति में बन जाती हैं। आज की परिस्थिति में जब हम व्यवस्था अवलोकन की बात करते हैं तो हमारे ध्यान में आता है कि आज ठहराव, रूककर चीजों को देखना, यह चीजें बड़ी दुष्कर हो गई हैं। उदाहरण भी दिया कहा, यहां बोल रहा हूं कि आप में से कुछ लोग अपने-अपने स्मार्ट फोन में कुछ देख रहे हैं। यह क्यों हैं। क्योंकि समाज की जो गति है, वह गति हमें एक तरीके से बाध्य भी करती है और उस गति के हम गुलाम भी बन जाते हैं। जिसके कारण समाज ठहराव को छोड़कर निरंतर चंचलता की स्थिति में आ जाता है। बच्चों के डांस क्लास में जाने के प्रसंग को साझा करते हुए कहा कि बहुत से लोग डांस क्लास में अपने बच्चों को भेजते हैं। क्योंकि डांस में निरंतरता चंचलता है। लोगों को ठहराव वाली चीज से यह ज्यादा पसंद आती हैं। इस सत्र में मध्यप्रदेश कैडर के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी व समाजशास्त्री मनोज श्रीवास्तव, महिला स्वावलंबन के योजनाओं की विशेषज्ञ व राज्यसभा सदस्य संपतिया उइके और लोकसत्ता पार्टी के संस्थापक व फाउंडेशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाॅर्मस के महासचिव जेपी नारायण ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन पत्रकार प्रफुल्ल केतकर ने किया ।
{ इनपुट – परमार डाॅट काॅम : सीवान, बिहार )
लोकमंथन :2018 के "व्यवस्थावलोकन" सत्र को राजनीतिक विचारक सह राज्यसभा सदस्य डा. विनय सहस्रबुद्धे ने किया संबोधित




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