*पूर्णिया से शुरू हुई होलिका दहन की परंपरा,होलिका का वध यहीं हुआ था*
👉धरहरा में भगवान नरसिंह मंदिर परिसर में है प्राचीन स्तंभ।

संजय कुमार सुमन 
सम्पादक, दैनिक खोज खबर 

रंगों का महान पर्व होली के एक दिन पहले होलिका दहन होता है। होलिका दहन बुराईयों पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है लेकिन यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का दहन बिहार की धरती पर हुआ था। जनश्रुति के मुताबिक तभी से प्रतिवर्ष होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत हुई। पूर्णिया जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर बनमनखी का सिकलीगढ़ धरहरा आज भी उस दिन का जीवंत गवाह है। होलिका का वध यहीं हुआ था। यह स्थल भगवान नरसिंह के अवतार स्थल के रूप में विख्यात है।गर्व का विषय है कि प्रेम व भाईचारे की होली पूर्णिया के देन है। उस दिन को हर साल यादगार बनाने के लिए हजारों की तादाद में सिकलीगढ़ धरहरा में लोग होलिका दहन के लिए जुटते हैं।

मान्यता है कि बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के सिकलीगढ़ में ही वह जगह है, जहां होलिका भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर दहकती आग के बीच बैठी थी। ऐसी घटनाओं के बाद ही भगवान नरसिंह का अवतार हुआ था, जिन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सिकलीगढ़ में हिरण्यकश्यप का किला था। यहीं भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए एक खंभे से भगवान नरसिंह ने अवतार लिया था। भगवान नरसिंह के अवतार से जुड़ा खंभा (माणिक्य स्तंभ) आज भी यहां मौजूद है। कहा जाता है कि इसे कई बार तोड़ने का प्रयास किया गया। यह स्तंभ झुक तो गया, पर टूटा नहीं।  प्राचीन काल में 400 एकड़ के दायरे में कई टीले थे, जो अब एक सौ एकड़ में सिमटकर रह गए हैं। पिछले दिनों इन टीलों की खुदाई में कई पुरातन वस्तुएं निकली थीं।

धार्मिक पत्रिका ‘कल्याण’ के 31वें वर्ष के विशेषांक में भी सिकलीगढ़ का खास उल्लेख करते हुए इसे नरसिंह भगवान का अवतार स्थल बताया गया था। इस जगह प्रमाणिकता के लिए कई साक्ष्य हैं। यहीं हिरन नामक नदी बहती है। कुछ वर्षो पहले तक नरसिंह स्तंभ में एक सुराख हुआ करता था, जिसमें पत्थर डालने से वह हिरन नदी में पहुंच जाता था। इसी भूखंड पर भीमेश्वर महादेव का विशाल मंदिर है। मान्यताओं के मुताबिक हिरण्यकश्यप का भाई हिरण्याक्ष बराह क्षेत्र का राजा था जो अब नेपाल में पड़ता है।

प्रह्लाद स्तंभ की सेवा के लिए बनाए गए प्रह्लाद स्तंभ विकास ट्रस्ट के अध्यक्ष बद्री प्रसाद साह बताते हैं कि यहां साधुओं का जमावड़ा शुरू से रहा है। वे कहते हैं कि भागवत पुराण (सप्तम स्कंध के अष्टम अध्याय) में भी माणिक्य स्तंभ स्थल का जिक्र है। उसमें कहा गया है कि इसी खंभे से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।
इस स्थल की एक खास विशेषता है कि यहां राख और मिट्टी से होली खेली जाती है। मान्यताओं के मुताबिक जब होलिका भस्म हो गई थी और प्रह्लाद चिता से सकुशल वापस आ गए थे, तब प्रहलाद के समर्थकों ने एक-दूसरे को राख और मिट्टी लगाकर खुशी मनाई थी। तभी से ऐसी होली शुरू हुई।  यहां होलिका दहन के दिन पूरे जिले के अलावा करीब 50 हजार श्रद्धालु होलिका दहन के समय उपस्थित होते हैं और जमकर राख और मिट्टी से होली खेलते हैं। यही कारण है कि इस इलाके में आज भी राख और मिट्टी से होली खेलने की परंपरा है।
भक्त प्रहलाद स्तंभ विकास ट्रस्ट की ओर से होलिका दहन कार्यक्रम की तैयारी की गई है। होलिका का विशाल पुतला तैयार किया जा रहा है। गुजरात राज्य के पोरबंदर में विशाल भारत मंदिर है। वहां आज भी यह अंकित है, भगवान नरसिंह का अवतार स्थल, सिकलीगढ़ धरहरा, बनमनखी, जिला पूर्णिया, बिहार। ब्रिटेन की विलकिपेडिया दि फ्री इनसाइक्लोपीडिया और गीता प्रेस गोरखपुर के कल्याण के ३१वें वर्ष के तीर्थांग में इस स्थल की महत्ता का जिक्र है।

आस्था का प्रतीक है स्तंभ

धरहरा में भगवान नरसिंह मंदिर परिसर में है प्राचीन स्तंभ। ऐसी धारणा है कि यह स्तंभ उस चौखट का हिस्सा है जहां राजा हिरण्यकश्यप का वध हुआ। यह स्तंभ 12 फीट मोटा और करीब 65 डिग्री पर झुका हुआ है।