” मैं चिल्ला चिल्ला कर कहूंगा कि नीरव मोदी के अपराध की सजा नरेंद्र मोदी को मिलनी चाहिए। ज्यादा नहीं तो कम से कम फांसी तो दे ही देनी चाहिए।”
✍सर्वेश तिवारी श्रीमुख

🌐विलियम शेक्सपियर कह गए “नाम में क्या रखा है”। मुझे लगता है विलियम अवश्य गाँजा पीते थे, वह भी ठेठ देहाती मार्का। गाँजा का पियक्कड़ हवाई बातें करने लगता है। इसी चक्कर में हमारे यशश्वी मुख्यमंत्री जी असफल मानव शृंखला बनवा कर परिहास करवा चुके हैं। भारत में तो नाम ही महत्वपूर्ण है। बहुत पहले किसी फिल्म में बादशाह बने अमरीश पुरी अपने साले को ताना मारते हुए कहते हैं-“तुम मेरी बीवी के भाई नहीं होते तो एक मामूली सिपाही होते”। तनिक सोचिये तो, राहुल यदि गाँधी नहीं होते तो आज क्या होते?
भारत के परिपेक्ष्य में यदि कोई कवि पूर्णतः सत्य सिद्ध होता है, तो वे तुलसी बाबा हैं। वे इस देश की हीर-हीर जानते थे सो कह गए “कलियुग केवल नाम अधारा”। भारत में सचमुच नाम की ही महिमा है। नीरव मोदी बैंक से कर्ज ले कर भाग गए, तो नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। मैं कहता हूं नरेंद्र ही क्यों, शुशील मोदी को भी जेल में डालो। देश के सारे मोदियों से यह पैसा वसूला जाय। आखिर नाम की बात है।
आठ दस वर्ष पहले हमारे यहां एक बाहुबली हुए डी. एन. तिवारी। पुलिस उनको ढूंढती फिरती थी। मेरे पड़ोस में थे एक बी.एन. तिवारी। गाँव के छोकड़ों ने उन्हें हड़का दिया कि एस पी ने आदेश दिया है “डी. एन नहीं मिलता है तो बी.एन को पकड़ो”। बेचारे बी.एन बाबा दिल्ली भागे तो डी.एन तिवारी के एनकाउंटर के बाद ही आये।
मैं लोकतंत्र का नागरिक होने के कारण सदैव यह मानता रहा हूँ कि गोलू की गलती की सजा भोलू को भी दी जा सकती है, क्योंकि दोनों का ‘लू’ समान है।लूलू की साम्यता गो-भो के भेद पर भारी पड़ती है, अतः इसमे कोई दोष नहीं है। मैंने जबसे प्रिया प्रकाश की आँख मारती तस्वीर देखी है, मुझे तब से सी.पी.एम. वाले प्रकाश करात भी आंख मारते प्रतीत होते हैं। सन्नी दयोल का स्मरण होते ही मेरे मानस में उनकी बिकनिनुमा अत्यल्प कपड़ों में ‘बेबी डॉल मैं सोने दी’ गाने पर कमर हिलाती छवि नाचने लगती है, मुझे सन्नी दयोल और सन्नी लियोनी में कोई अंतर नहीं दिखता। गुलशन कुमार की धार्मिक छवि से प्रभावित होने के कारण मैं गुलशन ग्रोवर को टीवी पर देखते ही प्रणाम कर लेता हूँ।
इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। देश में लोग जब नाम में साम्यता होने के कारण लाभ उठाते हैं तो हानि उठाने में क्यों भय होता है? जब जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री थे तब राज्य के सभी मिश्र नामधारी ब्राह्मण भी स्वयं को मुख्यमंत्री समझते थे। इस साम्यता का लाभ देने के लिए जगन्नाथ मिश्र ने मिश्र बहुल्य शिक्षा विभाग का वेतन दोगुना कर दिया था। लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के शासन काल मे यादव नामधारी व्यक्तियों का ओज सबने देखा है। रामबिलास पासवान की रैलियों में लाखों पासवान यूँ ही नहीं जुटते। फिर हानि से क्या भय? यदि कोई कहे कि चारा घोटाला के लिए बुजुर्ग लालू यादव के स्थान पर युवा अखिलेश यादव को सजा दी जाय,तो इसमें बुरा क्या है? चारा घोटाला के लिए ही बुजुर्ग जगन्नाथ मिश्र के स्थान पर यदि युवा साहित्यकार असित कुमार मिश्र को जेल में भेजा जाय तो मुझे खुशी होगी। मैं तो नीरव मोदी के स्थान पर डॉ नित्यानंद “नीरव” को सजा दिए जाने का पक्षधर हूँ। मेरा वश चले तो मैं प्रेम चोपड़ा को पटक पटक कर उनसे मुंसी प्रेमचंद के अधूरे उपन्यास “मंगलसूत्र” को पूरा करवा दूँ, और जयशंकर प्रसाद की अधूरी “इरावती” को पूरा करने की जिम्मेवारी रविशंकर प्रसाद को दे दूं। यूँ ही नहीं मुझे अपने मित्र साहित्यकार अतुल कुमार राय में ऐश्वर्या राय दिखतीं हैं।
वैसे मुझे एक बात का भय है। कल कोई व्यक्ति नारायण दत्त तिवारी के कुकर्मों की सजा मुझ सर्वेश तिवारी को देने की बात करे तो मैं कहाँ जाऊंगा, यह सोच कर चिंतित हूँ। सम्पत्ति के नाम पर कुल बारह चौदह बीघे जमीन है, उसमें भी कोई रोहित शेखर हिस्सा माङ्गे तो क्या करूँगा?
वैसे यह भय मेरे मजबूत इरादों को बदल नहीं सकता, मैं चिल्ला चिल्ला कर कहूंगा कि नीरव मोदी के अपराध की सजा नरेंद्र मोदी को मिलनी चाहिए। ज्यादा नहीं तो कम से कम फाँसी तो दे ही देनी चाहिए।
( साभार: परमार डाॅट काॅम )




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