गुरमेहर कौर की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ने वाला गैंग फिर सक्रिय है.

⏭इस बार अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए नहीं, 16 साल की नाहिद के सुरों को कुचलने के लिए.

नाहिद के खिलाफ कुछ उलेमा ने मिल कर एक रायशुमारी दी कि उसका गाना शरिया के खिलाफ है। टीवी अखबारों ने कहा कि नाहिद के गाने के खिलाफ फतवा आया। बस! गैंग को मौका मिल गया. लगे साबित करने में कि फतवा नहीं आया जी, बस चिट्ठी ही तो लिखी. कम से कम जिनकी पैरवी कर रहे, उन्हीं से पूछ लेते कि फतवा का मतलब क्या होता है? फतवा का मतलब ही है – राय यानि ओपिनियन.

शब्दों के जाल में उलझा कर एक बच्ची की लड़ाई को कमज़ोर करने वाले ये लोग उस रोज़ भी बेनकाब हुवे थे, जिस रोज़ सैफुल्लाह का एनकाउंटर हुआ और ये पूछने लगे थे कि साबित करो वो ISIS से जुड़ा था. जैसे ISIS अपने लोगो को आईडी कार्ड, पीएफ अकाउंट नंबर और सोशल सिक्योरिटी कोड जारी करता हो!

इनको उस रोज़ भी सांप सूंघ गया था जब ए आर रहमान के खिलाफ फतवा आ गया था. ये उस रोज़ भी चुप्पी साध गए थे जब ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरका’ फिल्म को सेंसर बोर्ड ने रोक दिया था. लेकिन संजय भंसाली की फिल्म के सेट पर तोड़ फोड़ हुई तो इनका ज़मीर फ़ौरन जाग गया.

ये देश तोड़ने के नारों को ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ बताते हैं और सिनेमा हॉल में ‘जन गण मन’ पे खड़े होने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को जबरदस्ती की संज्ञा देते हैं!

फ़ौजी का खाना खराब हो तो ये देश को आइना दिखाने कूद पड़ते हैं, लेकिन फ़ौजी कश्मीर में अलगाववादियों के पत्थर खा रहा हो तो इन्हें पैलेट गन लड़को पे अत्याचार लगती है.

वक्त आ गया है. इन्हें पहचानिए. बेनकाब कीजिये. और अपनी सोच पे इन्हें हावी होने मत दीजिये. ये अपने फायदे के लिए आपकी सोच को कुंद कर रहे हैं!
⏭फेसबुक वाल से साभार ⏭न्यूज स्रोत से खबर पढें .