गत्  21 मार्च, 2025 को दैनिक खोजखबर में इस सन्दर्भ में विवेकानन्द सिंह की एक छपी थी रिपोर्ट


दैनिक ख़ोजख़बर/छपरा। सारण के करिंगा में स्थित ऐतिहासिक डच मकबरा, जिसका निर्माण 1712 में हुआ था, को अब संरक्षित पुरातात्विक-स्थल के रूप में मान्यता मिल गई है। सुरक्षित घोषित करने के प्रस्ताव के आलोक में आपत्ति व सुझाव आमंत्रित किया गया था।जिलाधिकारी अमन समीर द्वारा इसी अप्रैल माह में अनापत्ति संसूचित की गई थी। अनापत्ति प्राप्त होने के उपरांत बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के पुरातत्व निदेशालय ने 16 अप्रैल को जारी अधिसूचना के माध्यम से इस स्मारक को “बिहार प्राचीन स्मारक और पुरातत्व-स्थल, अवशेष तथा कलानिधि अधिनियम, 1976” के अन्तर्गत सुरक्षित घोषित कर दिया है।

     ज्ञातव्य है कि गत्  21 मार्च, 2025 को दैनिक ख़ोजख़बर में इस सन्दर्भ में विवेकानन्द सिंह की एक रिपोर्ट छपी थी। जिसे पढ़कर देशभर के प्रबुद्धजनों ने अपनी टिप्पणियाँ भेजी, जो निम्नलिखित है –

डॉ. राणा प्रतापबहादुर सिंह – मैंने भी इसे देखा है, लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया। आपके ध्यान और ऐतिहासिक हाइलाइट्स के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। तहे दिल से बधाई और आत्मीय अभिवादन.. अपनी आवाज़ हमेशा ऊँची रखें.. आपका सप्ताहान्त मंगलमय हो..आपका मित्र.. राणा-जी
(डॉ. राणा पी. बी. सिंह, भारत में सांस्कृतिक भूगोल और विरासत अध्ययन, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और सोसाइटी ऑफ पिलग्रिमेज स्टडीज़ के संस्थापक अध्यक्ष हैं)

धीरेन्द्रनाथ सिंह – विवेकानन्द सिंहजी! मैने आपका लेख ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’ पढ़ा, आप द्वारा दी गई जानकारियाँ बड़ी रोचक एवं ज्ञानवर्धक हैं। सर्वविदित है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में भारत को तीन प्रेसीडेंसी, यथा – बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी में बाँटा गया था। उस दौरान बंगाल प्रेसिडेंसी के अन्तर्गत बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा को रखा गया था। जिनके ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक धरोहरों की देखभाल के लिए आबंटित राशि इंग्लैंड से आती थी। लेकिन अंग्रेजों ने कलकत्ता (अब कोलकाता) का भरपूर विकास किया, लेकिन बिहार एवं उड़ीसा (अब ओड़िशा) के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं पौराणिक धरोहरों पर समुचित ध्यान नहीं दिया। बहरहाल मैं आपके अथक प्रयासों के प्रति साधुवाद ज्ञापित करते हुए मुझे प्रबुद्ध करने के लिए आभार प्रगट करता हूँ।
(धीरेन्द्रनाथ सिंह कई भाषाओं के जानकार एवम् नाट्य व नृत्यशास्त्र के मर्मज्ञ हैं)

डॉ. विद्यानन्द सिंह – भारत में मुग़ल सत्ता के ह्रास के साथ-साथ बाह्य अंग्रेजी, फ्रान्सीसी, डच और पुर्तगाली व्यवसायिक कम्पनियों में सत्ता स्थापन संघर्ष हुआ। जिसमें अन्तिम परिणति के रूप में अंग्रेज भारत में में सफल रहे, ज्ञातव्य है कि डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा छपरा के आस-पास के क्षेत्र में साल्टपीटर (सोरा) का उत्पादन किया जाता था, जिसे अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने हस्तगत कर लिया। ‘दैनिक खोजख़बर’ में प्रकाशित, विवेकानन्द सिंह का लेख, ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’ गवेष्णात्मक, शोधपरक और ज्ञानवर्धक है, उन्होंने अपने लेख में तत्कालीन सन्दर्भों के लिए गजेटियर, जर्नल और स्थानीय लोगों के विवरण का सहयोग लिया है। आज के समय में जब हम अन्य विष‌यों में भटक रहे हैं और इतिहास को अलग नजरिये से देख रहे हैं। ऐसे में लेखक ने स्थानीय स्तर के इतिहास को आलोकित करने का सराहनीय कार्य किया है।
(पूर्व सहायक प्राध्यापक (इतिहास), बीकानेर)

डॉ० श्री भगवान सिंह – विवेकानन्दजी! आपका लेख पढ़ा, जिसमें आपने बताया है कि कैसे सुदूर नीदरलैंड के डच व्यापारी छपरा से भारतीय खनिज पदार्थ (शोरा) ले जाकर यूरोप में बेचते थे और हमारा आर्थिक दोहन करते थे। आपके इस लेख से आरा, बलिया और छपरा के लोग स्वयं को  गौरवान्वित महसूस करेंगे, क्योंकि सामान्यतः लोग यही समझते हैं कि हमारे भोजपुरीक्षेत्र में खनिज पदार्थ नहीं है, लेकिन आपके लेख ने  स्पष्ट कर दिया कि हमारी माटी में भी सोना है। आपका लेख इतिहास के विद्यार्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी है, साधुवाद।
(आप प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति, पुरातत्व एवं कला के अध्ययन तथा लेखन के साथ संग्रहालय दर्शन में रुचि रखते हैं)

डॉ. वन्दना सिंह – सारण जिला के करिंगा स्थित डच मकबरा के बारे में लिखे गए ज्ञानवर्धक लेख में जिस ऐतिहासिक-स्थल का विवरण दिया गया है, उसके बारे में सामान्यजन को अधिक जानकारी नहीं है। इस लेख में विवेकानन्दजी ने प्राथमिक स्रोतों के साथ ही मौखिक स्रोतों का भी उपयोग किया है। जिसके चलते यह लेख, सामान्य जिज्ञासुओं के अलावा इतिहास के शोधार्थियों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
(डॉ. वन्दना सिंह, जमुनीलाल महाविद्यालय, हाजीपुर के इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं)

पलाश सिंह – ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’ एक शोधपरक, रोचक एवम् शिक्षाप्रद लेख है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब शासन और प्रशासन के उच्चाधिकारी इस पुरातात्विक महत्व के धरोहर की महत्ता को समझें और उजागर करें, ना कि इसे महज़ एक दस्तावेज़ समझकर धूलों का आहार बनने के लिये कोने में टूटे पड़े किसी ताक पर रख दें।
(आप आश्रम वेब सीरीज़ के एसोसिएट डायरेक्टर हैं)

डॉ. श्रीमती शैलेश श्रीवास्तव –  ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’ पढ़के बहुत अच्छा लगा। मैं बलिया की निवासी हूँ और मुम्बई में रहती हूँ। मैने महसूस किया है कि महानगरवासी, हमारे क्षेत्र को बड़ी हीनभावना से देखते हैं, उनके मन में सदैव एक प्रश्न उठता है कि हम क्या हैं? कुछ है भी या नहीं? तो मैं उन सभी से कहना चाहूंगी कि वह, इस लेख को पढ़कर देखें कि हमारे क्षेत्र में प्राकृतिक सम्पदा का अकूत भण्डार है, जिसे देखकर डच और अन्य यूरोपियो यहाँ आकर रहे और हमारी खनिज सम्पदा को बेचकर मालामाल हो गए। लेकिन एक हम हैं कि अपने आपको पहचान नहीं पा रहे है, आप सभी से मेरा अनुरोध है कि कृपया अपने आस-पास की विलुप्त होती धरोहरों को बचाने का प्रयास करें।
(आप सेन्ट्रल संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित गायिका और लेखिका हैं)

लाईनेक्टिंग निशीथ – सम्पूर्ण भारतवर्ष में न जाने कितने ऐसे ऐतिहासिक धरोहर हैं, जो स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं, लेकिन अबतक उनपर साधारण-जन की दृष्टि नहीं पड़ी है। विवेकानन्दजी का लेख, ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’, जो ‘दैनिक खोजख़बर’ में प्रकाशित हुआ है,  पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मैं विवेकानंद को नमन करता हूँ, जिन्होंने अतीत के गर्त में छिपे एक विलुप्तप्राय धरोहर को सामने लाया और हम सबके ज्ञान में आशातीत वृद्धि की।
(आप कहानी कल्प सृजन के निर्देशक हैं)

कैप्टन सोहन सिंह – गत् 2021 मेंअन्नू बाबा फाउण्डेशन ने विवेकानन्द सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश और बिहार के इतिहास पर शोधकार्य कराने का निर्णय लिया; अब जाकर जिसका परिणाम ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’ (दैनिक खोजख़बर, 21 मार्च, 2025, सम्पादक-मनोकामना सिंह) के रूप में दिखाई दे रहा है।
(आप मर्चेंट नेवी में कैप्टन हैं)

बृजेश सिंह – विवेकानन्दजी के लेख को पढ़कर अच्छा लगा। आजकी भागमभाग भरे जीवन में हमें अपना इतिहास पढ़ने का समय नहीं मिलता है, लेकिन यदि ऐसे शोधपरक लेख लगातार छपते रहें, तो लोग अपने इतिहास को जानने और समझने में रुचि लेने लगेगें।
(आप अखिल भारतीय क्षत्रिय मंच के मण्डल प्रभारी हैं)

प्रवीण प्रताप सिंह – ‘करिंगा (छपरा) स्थित डच मकबरा का ऐतिहासिक सन्दर्भ’ में वर्णित घटना, जो  वाणिज्यवाद के शुरुआती दौर की है, के माध्यम से जानकर आश्चर्य हुआ कि कैसे सुदूर यूरोप के डच व्यापारी सारण में रहकर साल्टपीटर (शोरा) का व्यवसाय कर रहे थे। प्रस्तुत लेख शोधपरक और ज्ञानवर्धक है; इससे मुझे कई कड़ियों को जोड़ने का मौका मिला। इसके लिए विवेकानन्दजी को धन्यवाद।
(आप जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया के शोधार्थी (अर्थशास्त्र) हैं)

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