बिहार की राजनीति में जेपी आंदोलन को अगर समुद्र मंथन माना जाए तो उससे निकले हलाहल हम बिहारियों के हिस्से आया, तो फिर सारी निधियाँ कहाँ गईं ?

✍नवीन सिंह परमार
[परमार मीडिया- सीवान]
♨भारतीय पौराणिक कथाओं में एक समुद्र मंथन का जिक्र मिलता है। सुर-असुर दोनों ने मिलकर जो समुद्र मंथन किया था, उसमें कई निधियों के साथ हलाहल विष भी निकला था। जेपी आंदोलन को अगर बिहार की राजनीति में समुद्र मंथन माना जाए तो उससे निकले नेता ‘हलाहल’ ही लगते हैं। बाकी सवाल ये है कि अगर सम्पूर्ण क्रांति से निकल हलाहल हम बिहारियों के हिस्से आया, तो फिर सारी निधियाँ कहाँ गईं ?
मेरे जैसे व्यक्ति आज जब जेपी आंदोलन के इतने दिनों बाद उसका विश्लेषण करता है तो पाता है कि ये आन्दोलन बिहार को कई राजनीतिज्ञ देने के लिए याद किया जा सकता है। इस आन्दोलन से निकले लालू प्रसाद यादव 1977 में 29 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के सांसद बने। बिहार में वर्षो राज किया । आज कल चारा घोटाले के जुर्म में जेल की सजा काट रहे हैं। उनके शासन काल को बिहार में जातिवादी राजनीति के उदय के अलावा हाईकोर्ट की टिप्पणी में ‘जंगलराज’ घोषित करने के लिए भी जाना जाता है।
इसी आन्दोलन से रामविलास पासवान जैसे राजनीतिज्ञ भी उभर कर आए। वो कॉन्ग्रेस, गठबंधन और भाजपा सभी सरकारों में मंत्री होने के लिए याद किए जा सकते हैं। कभी-कभी उन्हें राजनीति का बैरोमीटर भी कहा जाता है। वो जिस पक्ष के साथ दिखें, उनकी चुनावी जीत की संभावना प्रबल होती है। अपने ही परिवार के लोगों को राजनैतिक पार्टी बना डालने में वो भी दूसरे समाजवादियों जैसे ही रहे हैं।
इसी आन्दोलन से निकले सुशील कुमार मोदी अभी बिहार के उप मुख्यमंत्री हैं और शायद बिहार के राजनीति में अभी सबसे नाकारा व विवश राजनेता हैं जो वर्तमान में बिहार एनडीए गठबंधन को बचाए रखने के चक्कर में अपने कार्यकर्ताओं के नजर में दिनोंदिन खलनायक बनते जा रहे हैं ।
इस आन्दोलन के ही उपज है हमारे सुशासन कुमार जो इन दिनों बिहार पर राज कर रहे है । कोई व्यक्ति सत्ता में कैसे मदहोश होकर अपने लक्ष्य से भटक जाता है । ये महाशय इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकते है ।
कुल मिलाकर आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर यह यक्ष प्रश्न मेरे जैसे लाखों बिहारी को परेशान कर रखा है कि बिहार की राजनीति में जेपी आंदोलन को अगर समुद्र मंथन माना जाए तो उससे निकले हलाहल हम बिहारियों के हिस्से आया, तो फिर सारी निधियाँ कहाँ गईं ?




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