पत्रकारिता क्यों करें : कुमुद रंजन सिंह
(लेखक नेशनल जर्नलिस्ट एसोसिएशन, भारत के राष्ट्रीय महासचिव है.)

नालंदा : आज जब मैं एक पत्रकारिता की हैसियत से किसी भी पत्रकार से बात करता हूँ, तो ऐसा लगता है कि पत्रकारिता करने का सपना पालकर बहुत बड़ी भूल कर दी।चूंकि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है और जनता को देश के अंदर की सभी बातें जिनसे उनका हित या अहित जुड़ा हुआ हो, उन तक पहुँचाना हो तो निश्चय ही परिश्रम तो अधिक ही होगा।लेकिन जब हमारे जैसे पत्रकार , समाज सेवा के साथ ही अपने जीवन की रोजी रोटी एकत्रित करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में कदम रखने के लिए लालायित होते हैं तो क्या इन वरिष्ठ पत्रकारों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे हमारा मनोबल बढाकर हमें सत्य के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करें?बजाए इसके इस क्षेत्र में मत आओ, अभी तुम्हारी क्या उम्र हुई है, सरकारी नौकरी की तैयारी करो, भविष्य संवारो, इत्यादि इत्यादि।अरे भई यदि सभी नौजवान युवक और युवतियां अपने भविष्य सुरक्षित करने की सोच को लेकर अपनी पढ़ाई करें तो आने वाले बीस से तीस सालों में कोई पत्रकार बचेगा क्या ?कहाँ जाएगा ये लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ, जो सरकारों की निरंकुशता को लगाम लगाकर हमें इनके दुष्कृत्यों से बाकिफ कराता है?मेरे साथ अभी हाल ही की एक ताजा घटना घटित हुई है जिसे मैं यहां जरूर बताना चाहूंगा।मैं एक समाचार पत्र के कार्यालय में सम्पादक जी से मिलने गया हुआ था, वो उस समय तक आये नही थे, तो मैं वहां विज्ञापन वाले कर्मचारियों से बात चीत करने लगा। उन्होंने बातों ही बातों में कहा ये क्षेत्र तो ऐसा है कि इसमें काम करने वाले लड़कों के साथ तो हम जैसे समझदार लोग अपनी लड़की की भी शादी नहीं करेंगे।अरे साहब आप स्वयं इसी क्षेत्र से अपनी रोजी रोटी चला कर इस तरह की बात करते हैं ऐसी बात करके तो आप अपनी तुच्छ मानसिकता को ही दर्शा रहे हैं।भविष्य के होने वाले पत्रकारो अगर सच में तुम्हें अपनी लेखनी का प्रयोग सही दिशा में कर देश की दिशा बदलनी है, तो सबसे पहले संघटित होकर मीडिया मालिकों के हाथों से अपना मेहनताना छीनो, वरना ये तुम्हें ऐसे ही मजदूरों की तरह कुचलकर तुमसे दिन रात काम कराकर खुद अपनी जेब भरने में तल्लीन हो जाएंगेकोई पत्रकारिता के इतिहास को खंगाल रहा है तो कोई इसकी साख बचाने का सुर अलाप रहा है। कोई इसकी बदलती शैली की दुहाई दे रहा तो कोई इसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के तौर पर होने के बावजूद सत्ता की कठपुतली का नाम दे रहा है।लेकिन कोई ये हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि 21वीं सदी की पत्रकारिता के उस विकराल रूप को लिखे, जहां आज के युवाओं के लिए यह क्षेत्र एक बेचैनी का सबब बन गया है। जो कल के भविष्य होंगे, उनका इस पत्रकारिता के महकमे को ख्याल तक नहीं है। बुद्धिजीवी, समाज के लोगों की आवाज़ बनकर चीखने-चिल्लाने वाला यह मीडिया आज अपने ही सहयोगी का गला घोंट रहा है। आज मीडिया में नौकरी नहीं हैं। कितने मीडियाकर्मियों को दिहाड़ी पर रखा जाता है और सीनियर का काम जहां अपने जूनियर की पीठ थपथपाने का होता था, वहां आज उसकी जगह टांग खींचने की हो गई है। जहां बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि मीडिया खुद में एक कालिख है, तुम इसका हिस्सा मत बनो।इन सबसे हटके जो एक बेहद अजीब बात है, वो यह कि मीडिया जो खास करके लड़कियों के साथ समाज में हो रही बर्बरता पर मुखर रहता है, लेकिन उनका क्या कहें जो अपने ही संस्थान की लड़कियों के साथ अन्याय करते हैं।मीडिया में लड़कियां अगर अपने आप को समर्पित कर दें तो नौकरियों की किल्लत कभी नहीं होगी, अगर बगावत कर दें तो ताउम्र बेरोजगार रहेंगी। ये आज के मीडिया की भयानक तस्वीर है। मीडिया में इंटरव्यू से पहले भी एक इंटरव्यू देना पड़ता है, जिसमें उस लड़की के दिमाग को भांपा जाता है कि ये सबकुछ करने को राजी होगी या नहीं। अगर आज मीडिया की यह स्थिति है तो जाहिर है कि यह रातों रात नहीं बनी होगी। यह पता नहीं मीडिया में लड़कियां ने अपनी मेहनत का क्या परिचय दिया, पुरुषों ने उस मेहनत को क्या समझा, लेकिन आजकल की लड़कियों को ऐसे हालातों से गुजरना पड़ता है।बड़े मीडिया चैनल्स की कहानी और भी निराली है। उन्होंने खुद की दुकान खोल ली हैं तो वहां वैकेंसी की गुंजाइश न के बराबर होती हैं। अगर कोई न्यूकमर रिज्यूमे भेजता है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कहा जाता है कि मीडिया में सब कुछ जुगाड़ से होता है। लानत है देश के चौथे स्तम्भ की इस विकृत मानसिकता पर और उन क्रांतिकारी पत्रकारों पर जो अपने ही घर के पाप को ढकते हैं और देश के लिए आवाज बनने का नाटक करते हैं।लोकतंत्र के एक मजबूत स्तम्भ की साख आज दांव पर है. जी हां मैं बात कर रहा हूं पत्रकारिता की, जो एक महत्वपूर्ण कड़ी है सरकार और जनता के बीच. समाज में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि यह जनता और सरकार के बीच सामंजस्य बनाने में मदद करता है. लेकिन ये अब ऐसे स्तर पे आ गया है जहां लोगों का भरोसा ही इस पर से खत्म होता जा रहा. इसका अत्यधिक व्यावसायीकरण ही शायद इसकी इस हालत की वजह है. पर जहां तक मैं सोचता हूं इसके लिए अनेक कारक हैं जो इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं. सोशल साइट्स, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इंटरनेट के जमाने में प्रिंट मीडिया कमजोर हो चला. क्योंकि व्हाट्सएप्प, ट्विटर और फेसबुक पर हर समाचार बहुत ही तेज़ी से फ़ैल जाता है और मिर्च मसाला लगाने में भी आसानी हो जाती है लोगों को. वायरल का फैशन चल पड़ा है तो कौन सुबह तक इंतज़ार करेगा? सभी समाचार पत्रों के ऑनलाइन एडिशन भी आ गए हैं पर उतने लोकप्रिय नहीं हैं, सभी अब फेसबुक का सहारा लेते हैं. क्या डिजिटल युग का आना ही इसकी लोकप्रियता कम होने का एकमात्र कारण है? न्यूज चैनलों की बाढ़ सी आ गयी है पर आज सच्ची और खोजी पत्रकारिता में गिरावट आ गयी, सभी मीडिया हॉउस राजनितिक घरानों से जुड़े हुए हैं, टीआरपी बढ़ाने की होड़ लगी है, ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा आम है, देश की चिंता कम विज्ञापनों की ज्यादा है. ये कारण भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं.राजनीति और पूंजीवाद से मीडिया की आजादी पर भी खतरा मंडरा रहा. पिछले कुछ वर्षों में मीडिया से जुड़े कई लोगों पर कितने ही आरोप लगे, कुछ जेल भी गए तो कुछ का अब भी ट्रायल चल रहा. आज पत्रकारिता और पत्रकार की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठता है? आखिर हो भी क्यों नहीं? वो जिसे चाहे चोर बना दे, जिसे चाहे हिटलर. कोर्ट का फैसला आता भी नहीं पर मीडिया पहले ही अपना फैसला सुना देता है. किसी का महिमामंडन करने से थकता नहीं तो किसी को गिराने से पीछे हटता नहीं. आज मीडिया का कोई भी माध्यम सच दिखाने से ही डरने लगा है. कहीं आज मीडिया सरकार से तो नहीं डर रहा? खोजी पत्रकारिता का असर कुछ भयानक होने लगा है. आये दिन पत्रकारों पर हमले होने लगे हैं. किसी भी क्षेत्र की त्रुटि और भ्रष्टाचार को सामने लाने से पत्रकारो को जान से हाथ धोने पड़ रहे. पत्रकार अपनी ईमानदारी से समझौता करने को विवश हो रहे. अगर ये सच है तब तो वो दिन दूर नहीं जब हम सच और निष्पक्ष खबरों के लिए तरस जायेंगे.मीडिया को लोकतंत्र का एक स्तम्भ माना गया है और इसकी अपनी महत्ता है क्योंकि यह हमारे चारों ओर मौजूद होता है, अतः यह निश्चित सी बात है की इसका असर समाज के ऊपर भी पड़ेगा. किसी ने भले ही कितने परोपकारी कार्य किये हों और अगर मीडिया चाह ले तो उसकी छवि एक पल में धूमिल कर सकता है. आज यही वास्तविकता है. ब्लैकमेलिंग का ज़माना है, सभी पूर्ण रूप से व्यापारी बन चुके हैं. डिजिटल युग में हर ओर प्रतिस्पर्धा है फलस्वरूप मीडिया को चलाने के लिए खर्चे भी बढ़े हैं. इन खर्चों को पूरा करने के लिए ज्यादातर मीडिया हाउस सरकार, पूंजीपति और बड़ी बड़ी कंपनियों पर आश्रित हो गए हैं. इन सब पर निर्भर होने से मीडिया की आजादी ही खतरे में आ गई है. नेता, दलालों से गठबंधन, ब्रेकिंग न्यूज़, विज्ञापन और अनेक हथकण्डे अपना मीडिया आज आर्थिक रूप से सक्षम है पर क्या वो अपनी पहचान और वो वजूद कायम रखने में सक्षम है? इसका जवाब आएगा ” नहीं”आज की जो पत्रकारिता है वो व्यापार के रूप मे देखी जा रही है मैं ने जो देखा है वो यह है की कुछ असामाजिक व्यक्ति जिन्होने आज पत्रकारिता कि परिभाशा को ही बदल दिया है आज यह देखा जा सकता है कुछ लोगो को यह लगता है की पत्रकारिता मे अच्छी कमाई है इस नजरिये ने लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ को हिला कर रख दिया है मै यह नही कहता की आप पत्रकारिता मत करिये लेकिन इसे देखने का नजरिया अवस्य बदले।कभी कभी मन कचोट जाता है कि ये नई पीढ़ी इतनी बेबस क्यों हो जाती है किसी से नौकरी की बात करने में। क्यों ‘सर’ लोगों के डिस्टर्बेंस की इतनी चिंता करती है। मकसद है पत्रकार बनना यहा तक ठीक है लेकिन पत्रकार ही क्यो जबाब पत्रकार बनकर सरकार हिला देना,लेकिन आप तो’सर’ से बात करने में खुद ही हिले नजर आते हैं। किसी की भी बात में कोई दावा नहीं होता। विनम्रता की पराकाष्ठा पर जाकर बात करते हैं, इतना विनयशील कोई पत्रकार हो नहीं सकता। जानता हूं कि कुछ ऐसे लोग हैं, जो फोन उठाते ही डांट सकते हैं। कह सकते हैं कि फोन मत करना। लेकिन कई कम्पनियो में ऐसे भी सीनियर हैं जिनसे कई लोगों ने बहस की और नौकरी भी पाई होंगी।आज कल जब सुबह सुबह फेसबुक पर चैट बॉक्स अचानक खुलता है- सर प्रणाम। जवाब-नमस्कार क्या हाल है। सर बढ़िया हूं, आप कैसे हैं।सर आपके सांथ आपके चैनल मे काम करना चाहता था। फिर कभी फोन पर मैसेज- सर प्रणाम। आपके सांथ में रहकर आपका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता हूं। एक मौका दीजिए आपके निर्देशन में काम करना चाहता हूंपत्रकारिता में कदम रखने वाले साथियों से कहना चाहता हूं कि पहले पूरी तैयारी कर लीजिए। फिर सोचिए यहां आने की। मीडिया के क्षेत्र में जंगल का कानून चलता है। यहां वही टिकेगा, जिसमें दम होगा। कई नए साथियों से बात किया हमने जिन्हे ठीक से हिंदी बोलना व लिखना भी नही आता है ये सब तब पता चला जब व्हाटस एप्प पर स्क्रिप्ट लिखने की बात आई , लेकिन ठीक से चार लाइन हिंदी भी नहीं लिख सकते। अब किस बिना पर काम ‘दे’ दें।