पुत्र की दीर्घायु के लिए माताओं ने 24 घंटे का उपवास रख की जीवित पुत्रिका व्रत

सोनपुर। पुत्र की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना को लेकर शनिवार को सोनपुर नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों की पुत्रवती महिलाओं ने श्रद्धा और आस्था के साथ जियुतिया व्रत किया।
महिलाएं 24 घंटे का उपवास व्रत रखकर पुत्र की दीर्घायु के लिए कामना की।इसके पूर्व शनिवार के भोर मे
महिलाएं पितराइनों को झिगुनी के पत्ते पर खरी व तेल रखकर, महिलाएं जिउतिया के भोर में चूल्हो, सियार व पितर पितराइन को व्रती अपने कुल की परंपरा के अनुसार नैवेद्य अर्पण किया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं पहलेजा घाट स्थित गंगा नदी सहित विभिन्न नदी घाटों पर पहुंचीं और विधि-विधान के साथ स्नान कर पूजा-अर्चना की।
स्नान के बाद महिलाओं ने भगवान जीमूतवाहन की पूजा की और व्रत का संकल्प लिया और कथा सुनी फिर गले में जितिया की माला भी धारण किया। महिलाओं ने अपने पुत्रों की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की सुख-शांति के लिए भगवान से प्रार्थना की। पर्व को लेकर सुबह से ही नदी घाटों पर महिलाओं की भीड़ देखी गई।
जियुतिया व्रत को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह रहा। स्थानीय स्तर पर जियुतिया पर्व को लेकर बाजारों में भी चहल-पहल रही। पूजा में उपयोग होने वाली सामग्री, फल, मिठाई तथा अन्य आवश्यक सामानों की खरीदारी के लिए दुकानों पर लोगों की भीड़ दिखाई दी। पूरे क्षेत्र में पर्व को लेकर धार्मिक माहौल बना रहा।
इस पर्व के करने से संतान की ओर आने वाली विपदा दूर हो जाती है। लोक सेवा आश्रम के संत मौनी बाबा ने बताया कि इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। जब भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए अपने सभी पुण्य कर्मों से पुनर्जीवित किया था।
था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती है।
जियुतिया कथा के अनुसार जीमूतवाहन गंधर्व के बुद्धिमान राजा थे। जीमूतवाहन शासक बनने से संतुष्ट नहीं थे। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने भाइयों को अपने राज्य की सभी जिम्मेदारियां दीं। अपने पिता की सेवा के लिए जंगल चले गए। एक दिन जंगल में भटकते हुए उन्हें एक बुढ़िया विलाप करती हुई मिलती है। उन्होंने बुढ़िया से रोने का कारण पूछा। इसपर उसने उसे बताया कि वह सांप (नागवंशी) के परिवार से है और उसका एक ही बेटा है। एक शपथ के रूप में हर दिन एक सांप पक्षीराज गरुड़ को चढ़ाया जाता है और उस दिन उसके बेटे का नंबर था। उसकी समस्या सुनने के बाद जजिमूतवाहन ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह उनके बेटे को जीवित वापस लेकर आएंगे। तब वह खुद गरुड़ का चारा बनने का विचार कर चट्टान पर लेट जाते हैं। तब गरुड़ आता है और अपनी अंगुलियों से लाल कपड़े से ढंके हुए जिमूतवाहन को पकड़कर चट्टान पर चढ़ जाता है। उसे हैरानी होती है कि जिसे उसने पकड़ा है वह कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहा है। तब वह से जिमूतवाहन से उनके बारे में पूछता है। तब गरुड़ जिमूतवाहन की वीरता और परोपकार से प्रसन्न होकर सांपों कोई और बलिदान नहीं लेने का वादा करता है। मान्यता है कि तभी से ही संतान की लंबी उम्र और कल्याण के लिए जितिया व्रत किया जाने लगा। भारत में ही नहीं विदेशों में रहने वाली भारतीय माताएं अपने संतान की रक्षा की कामना से करती चली आ रही हैं। कलयुग के आरंभ से ही।