** गोस्वामी तुलसीदास विश्व के महान साहित्यकार व कवि थे
** तुलसीदास ने समाज को राम के आदर्शों से जोड़ा है
** तुलसी सामाजिक सद्भाव और समन्वय के सबसे बड़े सेतु
** तुलसीदास भारतीय धर्म और संस्कृति का संरक्षक थे

कुमुद रंजन सिंह की रिपोर्ट
नालंदा।
27 जुलाई 2020 दिन सोमबार (श्रावण शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत 2077) को साहित्यिक मंडली शंखनाद नालंदा के तत्वावधान में भक्ति रस के कवि, कवि सम्राट गोस्वामी तुलसीदास की जयंती समारोह का आयोजन किया गया। यह समारोह स्थानीय बिहारशरीफ के बबुरबन्ना मोहल्ले में समाजसेविका सविता बिहारी के आवास पर साहित्यिक मंडली शंखनाद नालंदा के अध्यक्ष इतिहासकार साहित्यकार डॉक्टर लक्ष्मीकांत सिंह की अध्यक्षता में कोरोना वायरस संक्रमण के चलते सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए मनाई गई। समारोह का शुभारम्भ तुलसीदास के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित व दीप प्रज्वलित कर किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए शंखनाद नालंदा अध्यक्ष इतिहासकार साहित्यकार डॉक्टर लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा- गोस्वामी जी विश्व के महान साहित्यकार व शाश्वत जीवन मूल्यों के महाकवि हैं। उनकी शब्द संपदा विश्व के किसी भी साहित्यकार से अधिक है। उन्होंने कहा तुलसीदास के ऊपर सबसे अधिक शोध किये गये हैं। तुलसीदास रचित रामायण का अनुवाद दूसरी भाषाओं में सबसे अधिक किया गया है। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने बजरंग बली हनुमान को इतना अलंकृत चित्रण किया कि वे जन-जन के संकटमोचन बन गए। अगर गोस्वामी तुलसीदास जी नहीं होते तो बजरंग बली हनुमान को कोई इतना जानता भी नहीं। संस्कृत रामायण अर्थात वाल्मीकि रामायण में बजरंग बली हनुमान का जिक्र उतना रोचकता पूर्ण नहीं है। वाल्मीकि रामायण में ज़िक्र आता है कि हनुमान ने सागर तैरकर पार किया। मगर तुलसीकृत रामचरित मानस के सुंदर कांड में हनुमान जी समु्द्र लांघकर पार कर जाते हैं। दरअसल तुलसी जिस नायकत्व को जनता में बिठाना चाहते थे, उसके लिए इस तरह का वर्णन ज़रूरी था। उन्होंने कहा मानव कल्याण, धर्म, नीति और सदाचार का जितना प्रचार तुलसी के ग्रन्थों द्वारा हुआ है उतना किसी अन्य ग्रन्थों द्वारा नहीं। चौतरफे हमले से हमारी धर्म-संस्कृति की रक्षा की तथा पंच मकारी प्रयोग से हमारे समाज को बचाया भी। तुलसी के समग्र काव्य को विश्व-साहित्य की सर्वोत्तम धरोहर तथा म्रियमाण समाज के लिए संजीवनी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

कार्यक्रम संचालन करते हुए साहित्यिक मंडली शंखनाद नालंदा के सचिव राकेश बिहारी शर्मा ने कहा- तुलसीदास एक समाज सुधारक, रामभक्त कवि हैं और वह मध्यकालीन सगुण काव्य की रामभक्ति काव्य के संत तथा प्रमुख कवि हैं। इसी के साथ उनका जन्म विक्रमी संवत 1589 में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में हुआ था, ऐसा विद्वानों का मत है। महान कवि तुलसीदास की अलौकिक प्रतिभा से न केवल भारतीय समाज ही बल्कि समस्त संसार आलोकित हो रहा है। बड़ा अफसोस है कि उसी कवि का जन्म-काल विवादों के अंधकार में पड़ा हुआ है। गोस्वामी तुलसीदास के जन्मतिथि के बारे में विद्वानों में मतभेद है।लेकिन
अलग-अलग विद्वानों के अनुसार उनका जन्म बहुत ही विवादित है जैसे कि कहीं-कहीं यह 1497 ई., 1511 ई., या 1532 ई. तो कोई 1589 को मानते हैं, लेकिन सभी लोग इस बात पर राजी हैं की उनका जन्म श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को ही हुआ था।हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर सभी एकमत हैं। उनकी मृत्यु 1623 ई. में हुई थी। शोधकर्ताओं के अनुसार उनकी माता का नाम हुलसी था और इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे था। वहीं उन्होंने अपने गुरु नरहरिदास से शिक्षा प्राप्त की थी और नरहरीदास जी ने तुलसीदास को शिक्षा देने के साथ ही इन्हें एक नया नाम रामबोला दिया था। कहा जाता है उनके माता-पिता की मृत्यु इनके जन्म के कुछ वर्षों के पश्चात् हो गई थी और माता-पिता के गुजरने के बाद इन्होने अपना जीवन अयोध्या, चित्रकूट तथा काशी जैसे पवित्र स्थानों पर व्यतीत किया था। वहीं तुलसीदास आचार्य रामानंद के शिष्य थे और तुलसीदास जी के माता व पिता की मृत्यु हो जाने के बाद तुलसीदास इधर-उधर भटकते थे। कहा जाता है भटकते-भटकते ही इनकी भेंट रामानंद जी हुई थी और उन्होंने उन्हें सगुण काव्यधारा का ज्ञान दिया और तुलसीदास ने रामानंद जी का शिष्य बनने के बाद ही वाल्मीकि के द्वारा रचित रामायण को लोक भाषा अवधि में रचा तथा इसे रामचरितमानस नाम दिया। वहीं उसके बाद तुलसीदास की ख्याति ही रामचरितमानस ग्रंथ के द्वारा हुई थी। आपको बता दें कि तुलसीदास जी रामचरितमानस के रचयिता होने के साथ-साथ एक साहित्यकार भी थे। वहीं वह भक्तिकालीन सगुण काव्यधार के प्रसिद्ध कवि थे और तुलसीदास ईश्वर के प्रतिरूप की उपसना, ईश्वर के नाम की माला का जप करने तथा ईश्वर के अवतारवाद की पूजा करने के समर्थक थे। इसी के साथ सगुण काव्यधारा के रामभक्त शाखा के कवि थे तथा राम को अपने जीवन का आदर्श मानते थे और उन्होंने कई ग्रंथों की रचना भी की थी। इन सभी में रामचरितमानस, कवितावली, विनयपत्रिका, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण शामिल हैं। उन्होंने लोगों से अनुरोध किया कि तुलसीदास को अपने दिलों में बसायें।

समाजसेवी अनिल पासवान ने गोस्वामी तुलसीदास के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि उन जैसा मानव वैज्ञानिक न तो पहले हुआ, न भविष्य में होगा। उनके ग्रंथ संसार के पथ प्रदर्शक हैं। उन्होंने बताया कि गोस्वामी जी का जीवन संघर्षें से भरा हुआ था। इसके बावजूद धर्म के प्रति उनकी आस्था कम नहीं हुई। भगवान राम की सार्थक उपासना के परिणाम स्वरूप उन्होंने रामचरित मानस की रचना कर युगों युगों तक लोगों को आस्था से जोड़े रखने का माध्यम प्रदान किया।

समाजसेवी धीरज कुमार ने कहा कि रामायण महाकाव्य नहीं बल्कि साहित्य, समाज एवं संस्कृति की आचार-संहिता है। तुलसीदास को साहित्य एवं संस्कृति ऐसा सूरज बताया गया जिसके आलोक में मानवता, राष्ट्रवाद, साहित्य, एवं संस्कृति लंबे समय तक अपना रास्ता ढुंढ़ती रहेगी।

समाजसेविका सविता बिहारी ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण भक्ति की ऐसी राम भक्तिधारा को प्रवाहित किया जो आज भी प्रवाहित हो रही है। गोस्वामी जी ने राम भक्त द्वारा न केवल अपना जीवन कृतार्थ किया बल्कि सभी को श्रीराम के आदर्शों से बांधने की कोशिश भी की। उन्होंने लोक भाषा में राम कथा की रचना की। तुलसीदास जी का नाम आते ही प्रभु राम का स्वरूप उभरकर सामने आता है। तुलसीदास जी सभी के लिए सम्मानीय और पूजनीय रहे।

कार्यक्रम के अंत में छात्रा स्वाति कुमारी ने तुलसीदास की रचना ‘श्रीरामचंद्र कृपाल भजमन’ का सस्वर पाठ किया।
इस अवसर पर समाजसेवी ब्रज भूषण प्रसाद, शिक्षाविद् बद्रीनारायण राय, अरुण बिहारी शरण मौजूद रहे।