Θ नोएडा:– राष्ट्रीय वेब-गोष्ठी में भारत-नेपाल सम्बन्ध पर चर्चा

✍️न्यूज इनपुट नीरज ठाकुर बेतिया (प०च०) बिहार 👉

नोएडा। अंतराष्ट्रीय सहयोग परिषद भारत के नोएडा इकाई ने श्री बालेश्वर अग्रवाल जन्म शताब्दी स्मृति पर वेब-गोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम के दौरान बतौर मुख्य अतिथि गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा, मुख्य वक्ता नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत मंजीव सिंह पुरी, विशिष्ट अतिथि जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर संगीत थपलियाल, के साथ अंतराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महामंत्री श्याम परांडे ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। “भारत नेपाल सम्बन्धः भविष्य का पथ” विषय पर आयोजित इस वेब गोष्ठी की अध्यक्षता पूर्व विदेश सचिव श्री शशांक ने की। वहीं कार्यक्रम का संयोजन फिजी नेशनल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. सुरेन्द नाथ गुप्ता के नेतृत्व में हुआ।

कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए भारत के पूर्व विदेश सचिव श्री शशांक ने कहा कि हमारे रिश्ते नेपाल के साथ हमेशा अच्छे रहे हैं। हमने हमेशा सोचा कि ये रिश्ते ऐसे ही चलते रहेंगे। नेपाल में प्रजातंत्र का भी अपने समर्थन किया है। नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता यहां पढ़े भी हैं और भारत के वाम नेताओं के साथ संपर्क में रहे हैं। जब भी नेपाल के संबंध दूसरे देशों ने हथियार देने का प्रयास किया तो भी भारत ने दूसरे देशों को भी समझाया। भारत ने हमेशा प्रयास किया कि नेपाल के राजनीतिक दलों के मधुर संबंध रहें और भारत तथा नेपाल के संबंध भी अच्छे बने रहें। जिस तरह चीन ने दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया है। पाक ने कई बार इसका लाभ उठाया। भारत का हवाई जहाज नेपाल से हाईजैक किया गया। कई बार फेंक करेंसी भी नेपाल के रास्ते भेजी गई है। इसके बाद भी भारत ने रिश्तों को बनाए रखा। बीते कुछ दिनों में चाइना नेपाल के करीब आया है। चीन के पक्ष में जाना नेपाल के लिए सही नहीं है। नेपाल की जनता भी यही समझेगी। भारत सबसे पहले नेपाल की मदद के लिए आगे आता है। वहा भूकंप के दौरान भी भारत आगे आया। भारत ने न्यूज चैनल कवरेज से नेपाली नाराज हुए। भारत के डाले हुए प्रोजेक्ट समय से पूरे नहीं होते, उधर चीन की तरफ से डाले गए प्रोजेक्ट समय पर पूरे हो जाते हैं। वहीं उन्होंने सुझाव दिया कि नेपाल के साथ बने हुए रिश्तों को आगे बढाए। वहां चल रहे प्रोजेक्ट को समय से पूरा किया जाए। लिपुलेख जैसे मामलों पर नेपाल के साथ बातचीत हो। ऐसी सड़क बनने से दोनों देशों से लाभ मिलेगा।

वहीं पूर्व राजदूत मंजीव सिंह पुरी ने कहा कि भारत और नेपाल के जैसे संबंध हैं, वे दुनिया में कहीं नहीं है। भारत और नेपाल के बीच संबंध में पहले भी खराब हुए। नेपाल में दो सौ साल से एक चीज महत्वपूर्ण रही है। वह है आइडेंटीटी पालिटिक्स। पहाड़ पर ब्राहमण औरर क्षत्रिय डोमिनेट करते हैं। भारत कहता है कि नेपाल तो हमारा है, लेकिन नेपाल में रहने वाला खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानता। वह खुद को नेपाली मानता है। भारत के साथ दो तिहाई व्यापार है। सबसे ज्यादा नेपाल में भारत ने निवेश कर रखा है। 2105 में जब नया संविधान लागू हुआ। सभी पार्टियों ने इसके लिए वोट किया। भारत के साथ हुए मौजूदा मामले पर नेपाल में सभी सांसद एकजुट हुए। नेपाल छोटा राज्य है। वहां राष्ट्रवाद ज्यादा है। 2018 में जब पीएम मोदी नेपाल गए तो जनकपुर में एक लाख नेपाली लोगों ने उन्हें सुना। नेपाल को समझना होगा कि चाइना कार्ड उसके लिए खराब है। 25-30 फीसदी नेपाल की जनसंख्या पूरी दुनिया में फैली हुई है। नेपाल की जीडीपी का तीस फीसदी हिस्सा बाहर से आता है। नेपाल के बच्चे पश्चिमी देशों में पढ़ने के लिए जा रहे हैं। नेपाल में ईसायित का प्रभाव बढ़ रहा है। भूकंप के समय लोग गिरीजाघरों से राम राम करते हुए बाहर निकले थे। नेपाल का लगभग हिन्दुस्तान जितना बार्डर ही चाइना से लगता है। चाइना का प्रभाव नेपालमें हर जगह दिखता है। भारत नेपाल के 98 फीसदी बार्डर मामले पर कोई विवाद नहीं है। औली सरकार ने अपने खतरे को देखते हुए एंटी इंडिया कदम उठाए गए। इसमे कोई शक नहीं है कि वाम विचारधारा इंटरनेशनली है। चाइना और नेपाल के कम्यूनिज्म में भले ही अंतर है, लेकिन बातचीत में वह एक ही हैं। नेपाल की इस राजनीतिक व्यवस्था का चाइना लाभ ले रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि नेपाल में निवेश बढ़ानी होगी। गत वर्ष इंडिया नेपाल पाइपलाइन 1.6 वर्ष में बनाई गई। पहली बार बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट शुरू किए गए। ये बदलता नेपाल है, वहां मध्यमवर्ग बढ़ रहा है। इनकी जरूरतें पूरी करने के लिए यूपी, बिहार के बार्डर पर क्या कर सकते हैं। बार्डर पर माल बनाएंगे तो वहां बड़ी संख्या में लोग आएंगे। सिलीगुड़ी में बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

जेएनयू प्रोफेसर संगीता थपलियाल ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि स्वतत्रता के लिए भारत और नेपाल मिलकर लड़े हैं। लोकतंत्र के लिए दोनों देशों ने संघर्ष किया है। भारत और नेपाल की वर्तमान लीडरशिप 1947 के बाद पैदा हुई है। वे भावनाओं का बोझ नहीं ढो रहे हैं। 1988 से 2004 तक कोई भी भारतीय पीएम नेपाल नहीं गया। इससे नए राजनीतिक लिंक नहीं बने। भारत नेपाल का सबसे बड़ा साझीदार है। सौ फीसदी पेट्रोलियम प्रोडेक्ट भारत से जाते हैं। सबसे ज्यादा निवेश भारत ने वहां किया था। भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी जब 2014 में नेपाल गए थे तो इंफ्रास्ट्रक्चर और सड़कों को लेकरसमझौते हुए। इनमे देरी हुई है। दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का संबंध आज भी जिंदा है। नेपाली कहते हैं कि भारत में चार वर्ण हैं, लेकिन नेपाल में तीन वर्ण हैं। यह वैश्य तो हैं ही नहीं। नेपाल के पयर्टन में भी चीनी दखल बढ़ रहा है। बड़ी संख्या में चीनी पर्यटक नेपाल पहुंच रहे हैं। भारत की मिडिया में हमेश भारत को चाइना के काउंटर दिखाया जाता है। अगर भारत ने कोई पुल बनाया तो चाइना की हार बताई जाती है। अगर कोई स्कूल बनता है तो मीडिया बताता है कि यह चाइना की हार है। इससे नेरेटिव बनता है कि वहां चाइना का ज्यादा प्रभाव है और भारत उसे काउंटर करने का प्रयास कर रहा है। भारत को सभी राजनीतिक दलों के साथ संबंध बनाने होंगे। कोई पार्टी सही और खराब का नेरेटिव बनाना सही नहीं है। नेपाल में धारणा बन रही है कि चाइना डिलिवर करता है और भारत अपने प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पाता है। भारत को इस नजरिए को बदलने की जरूरत है।

वहीं जीबीयू के कुलपति भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि भारतीय पीएम जवाहर लाल नेहरू ने तिब्बत के मामले पर कहा कि यह चीन का आंतरिक मामला है। उनके मंत्रीमंडल के सहयोगियों ने इस मामले में दखल देने को कहा, लेकिन जवाहर लाल जी ने अपनी मर्जी से सब किया। अगर तिब्बत के मामले पर सही फैसला होता तो नेपाल की कोई सीमा चीन के साथ नहीं लगता। इसके बाद पीएम मनमोहन सिंह के मामले पर वाम दलों के साथ समझौते में तय किया गया कि नेपाल के मामले सीताराम येचुरी देखेंगे। उस समय नेपाल ने छह बार भारत से स्माल आर्म मांगे। वहां ला एंड आर्डर की स्थिति थी।गांव गांव में माओवादी सर्कल बन गया। यूपीए वन के दौरान अगर भात वाम दलों के दबाव में काम नहीं करते तो माओवादी सत्ता में नहीं आते। जितने भी ट्रांजित प्वाइंट है। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलेप करने का प्रयास नहीं किया गया। वहां के व्यापारियों का कहना है कि सामान खुले में भीगता रहता है। उनको जो सुविधाएं दी जानी चाहिए थी, वे नहीं दी गई। तराई क्षेत्र में बड़ी संख्या में शादियां होती है। अगर सड़कों के संदर्भ में काम किया जाता तो नेपाल भी भारत का हिस्सा ही लगता। अगर टूरिज्म का रामायण सर्किट बनाया जाए। जनकपुर से लेकर श्रीलंका तक यह सर्किट बनाया जाए तो जीडीपी में बड़ा हिस्सा आएगा। इससे भी इंटीग्रेशन होगा। तराई के लोग हमारे साथ आत्मीयता महसूस करते हैं। पहाड़ के लोगों में भारत के प्रति अच्छा भाव नहीं है। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा निवेश करना होगा। सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाना होगा। मैथिल लोगों के साथ गोष्ठी और मैत्री संघ बनाकर आयोजन करने चाहिए। मेड बाइ इंडिया प्रोडेक्ट को बढ़ावा देने की जरूरत है।