पिछले   शनिवार को कांग्रेस ने पटना में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की 130वीं जयंती मनाई. यह आयोजन मुख्य रूप से कांग्रेस के नेता और भारत सरकार के पूर्व मंत्री अखिलेश प्रसाद सिंह के नेतृत्व में आयोजित किया गया ।
जयंती समारोह में लालू प्रसाद यादव मुख्य अतिथि थें । लालू जी ने अपने आदत के अनुसार समारोह में जम कर बोला । उन्होंने  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को आरे हाथ लिया । वे सब कुछ बोले, लेकिन जिस श्रीबाबू की जयंती थी ।उनके विषय में एक लाइन नहीं बोला । आखिर लालू प्रसाद ने श्रीबाबू के संबंध में क्यों नहीं बोला?  बिहार का हर एक जागरूक नागरिक आज यह प्रश्न पूछ रहा है कि ” श्रीबाबू की जयंती समारोह में मुख्य अतिथि लालू प्रसाद यादव ने उनके विषय में कुछ क्यों नहीं बोला ? 
इस प्रश्न का उत्तर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने अपने फेसबुक वाॅल पर दिया है । प्रस्तुत है सुरेंद्र किशोर जी का उत्तर हूबहू उनके शब्दों में —

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर जी के फेसबुक वाॅल से –
हमारे जागरूक फेसबुक मित्र अनिल सिंहा ने आज  लिखा है कि पटना में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि ,श्री बाबू पर कुछ कहने के बजाए अपने विरोधियों के खिलाफ बोलने में ही लगे रहे।
   अनिल जी ने ठीक ही कहा।पर क्या कीजिएगा !
आजकल ऐसे अवसरों पर ऐसा ही होता है।सिद्धांतवादी स्वतंत्रता सेनानियों की जयंती मनाने का उद्देश्य ही कुछ दूसरा होता है।
 गांधी युग के वैसे महा पुरूषों के बारे में आज के अवसरवादी नेता आखिर बोलंे तो बोलें क्या ?
 यह तो बोल नहीं सकते कि श्रीबाबू ने अपने पुत्र को अपने जीवन काल में विधायक तक नहीं बनने दिया तो मैं भी उनके ही रास्ते पर चलूंगा !
यह भी नहीं बोल सकते कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद श्रीबाबू ने अपना एक मकान तक पटना में नहीं बनवाया तो मैं भी नहीं बनाऊंगा।
श्री बाबू ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को व्यक्तिगत दुश्मन नहीं माना तो मैं भी नहीं मानूंगा,आज के नेता यह बात किस मुंह से बोलेंगे ?
  यह कैसे बोलेंगे कि चुनाव के समय श्रीबाबू अपने चुनाव क्षेत्र में नहीं जाते थे तो मैं भी नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं बाकी के पौने पांच साल तो अपने क्षेत्र की जनता की  सेवा करता ही हूं !
  इस बात की चर्चा आज के कितने नेता कर सकेंगे कि श्री बाबू के निधन के बाद उनके पास कुछ ही हजार रुपए मिले थे जो उनके मित्रों और समर्थकों के लिए रखे हुए थे ।यह सब बोलने में शर्म नहीं आएगी !
 उनके गुणों की चर्चा करने और उनसे सीख लेने की लोगों से अपील करने में आज के अधिकतर नेताओं के सामने कठिनाइयां हैं ! क्योंकि, वे  खुद उस तरह की जीवन शैली से काफी दूर  हैं।
  इसीलिए ऐसे अवसरों पर भी आज के अधिकतर नेता अपने ताजा राजनीतिक एजेंडे को ही आगे रखते हैं।बेचारों पर दया कीजिए अनिल बाबू !

✍संकलन : नवीन सिंह परमार 
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