#आयो सावन बड़ो मनभावन रिम झिम बरसे बदरिया ना 
#इतिहास बनती जा रही है लोक गीतिक संस्कृति 
#नहीं सुनाईं पड़ते चौपालों से लेकर देवालयों में बरसाती कजरी  बारह मासा चौमासा
🎩राणा परमार अखिलेश 🎩
 🌋भोजपुरी अवधि मैथिली बुंदेलखंडी लोक संस्कृति लोकगीतिक नृत्य, नाट्य संगीत में रची बसी है।किंतु बाजारवादी अपसंस्कृति प्रभाव से इतिहास बनती जा रही है,लोकगीतिक परंपराएं।बहरहाल, ग्रामीण चौपालों से लेकर शिवालयों व देवालयों में अब नहीं सुनाई पडते बरसाती ” आयो सावन बड़ो सुहावन रिम झिम बरसे बदरिया ना ।”
भोजपुरी लोक गीतिक परंपरा : – भोजपुरी लोक संस्कृति पश्चिमी बिहार पूर्वांचल उत्तर प्रदेश ,छत्तीसगढ,व नेपाल तक विभिन्न संस्कृतियों को आत्मसात कर श्रम को भी सांगीतिक सांचे में ढालकर लोक जीवन को रसवत्ता प्रदात्री रही है । बसंत पंचमी से लेकर रामनवमी व सतुआनी तक होली चैता चैती कोरस गायन के द्वारा लोक मनोरंजन करती आयी है। सावन माह के शुभारंभ गुरु पूर्णिमा से ही अनादि आदि सदाशिव की वंदना के साथ ही सोमवारी जलाभिषेक व सांगीतिक स्वर लहरियों में गायक मंडली से लेकर श्रोता व दर्शक डूबने उतराते रात काट लेते थे । ग्रामीण रामायण गायन मंडलियों के व्यास (मुख्य गायक ) ठेकैता (ढोलक वादक) झलकुटिया -का दे के शिव के मनाईं हो शिव मानत नाहीं’ के स्वर कोर्ट टेक देते हुए अरोह आरोह में खेमटा कहंरवा दीपचंदी ताल के साथ दादरा,कजरी टप्पा तिलाना और धमार पर धमाल मचाते थे”; -भोले बाबा औढरदनियां दुखवा हरीं ना हमार।” मैथिली मागधि संस्कृति भी भोजपुरिया गीतिक परंपरा की पोषक रही है। बनारस मिर्जापुर गोरखपुर तक बिरहा कजरी गायन व्यासशैली का ही रूप है । बुंदेलखंड में  पावसोत्व
आल्हा गायन से होता था “आयो महिना है सावन में घर घर होत मंगलाचार/मिलजुल सखियां मंगल गावै गावै कजरी और मल्हार । बहरहाल, हस्त नक्षत्र की झरी में लोक जीवन आल्हा सोरठी बृजभार पासवान पखावज पर देवी गीत रेशमा-चुहरमल प्रेम गीत गूंजते थे। चक्की से आंटा पिसनेवाली हमारी मां बहने जांतसारी धान की रोपनी में रोपनी गीत अब इतिहास बन गए। कुछ लोकगीतिक परंपरा का एक अलबम आंग्ल विद्वान प्रोफेसर केके द्विवेदी ने संजो कर रखा है।
नहीं रहीं ग्रामीण कीर्तन मंडलियां :- भोजपुरी जनपदो में हर गांव बिरादरी की कीर्तन गायन मंडलियां सामूहिक व समाजिक लोकगीतिक मंडलियां थी। दरी सफेद बर्तन से लेकर ढोलक झाला हारमोनियम तासा हुर्का पखावज सामूहिक चंदे से खरीदे जाते थे । सत्यनारायण कथा त्रिलोकी नाथ कथा अष्टयाम आरती गायन रामायण गायन निशुल्क होते थे । अब न व्यास जी रहे और न मंडलियां। 
बाजारवाद निगल गई लोक गीतिक परंपराएं :- कैडेट्स कंपनियों के  आगमन के साथ लोकगीतों का बाजार भाव गरम हो गया । व्यास स्वर्गीय बाबू वीरेंद्र सिंह के साकेतधाम प्रस्थान के बाद टी सिरीज के तहत व्यास जी अनुबंध हुआ । फिर भी भोजपुरी लोक गीतों का शील ढिल नहीं हुए बाबू बच्चा सिंह सिवान,महातम तिवारी महान प्रेमसागर, गायत्री ठाकुर रामपुलिस राय वीरेंद्र सिंह जनेश्वर सिंह  बोध बाबा नथुनी सिंह भरत शर्मा गुलाब शर्मा  बेंचू मियां तक ने भोजपुरी की आत्मा को निष्कलंक रखा। किंतु वर्ष  1990 के  बाद तपेश्वर चौहान, विजेंद्र गिरि, परशुराम  गौतम तूफान जैसे स्वयंभू व्यासों ने व्यवसायिक बना दिया ।अब तो अष्टयाम भी गाने गवाने में रूपए खर्च करना पड़ता है । रामायण होली चैता कजरी बरसाती सुनने के लिए मुद्रा चाहिए । अब तो राधे श्याम रसिया, खेसारी लाल यादव, संजीत सुरिला, अरूण अलबेला,सुमन सिंह का प्रोग्राम का सट्टा रोज है।