
दलित बस्तियों में बच्चों के टीकाकरण का सूत्रधार बनीं अंजू
– टीका दिलवाने एक ही घर में तीन बार जाती थी
– बाढ़ जैसी विषम परिस्थिति में भी घर -घर सर्वे का काम किया पूरा
वैशाली,9 दिसंबर ।
आशा से आशा फैसिलिटेटर तक की 16 वर्षो की यात्रा में यूं तो अंजू ने कई जिम्मेदारियां निभाई हैं। आधी रात में गर्भवतियों को अस्पताल पहुंचाना, उनके साथ उनके बच्चों की सही देखभाल की जानकारी, परिवार नियोजन की जानकारी जैसी कई कार्य किए हैं। इन सबके बीच महुआ प्रखंड के डगरू और सैदपुर माणिकपुर में आशा फैसिलिटेटर के रूप में अंजू को सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण दलित बस्तियों के बच्चों में टीकाकरण के प्रति विश्वास को लेकर लगा। फिर अंजू ने एक नहीं दो नहीं तीन -तीन बार बच्चों के टीकाकरण को लेकर उनके घर जाती रही। धीरे-धीरे उनकी इस आदत और सही जानकारी से दलित और अल्पसंख्यक टोलों के बच्चों के टीकाकरण में तेजी आयी। आज हालात यह है कि करीब 90 प्रतिशत से अधिक दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों में टीकाकरण को लेकर काफी उत्साह देखा जा सकता है। टीकाकरण के लिए अंजू के मन में यह ललक देख स्थानीय स्वयंसेवी संस्थानों ने प्रशस्ति पत्र देकर इनका मान बढ़ाया है।
संस्थागत प्रसव में दिखायी राह –
अंजू कहती हैं कि संस्थागत प्रसव में आज उनका क्षेत्र काफी आगे है। घर में प्रसव यहां शायद ही कोई कराता हो। यह सारा परिवर्तन अस्पताल में मिली सुविधाओं की वजह से है। अंजू कहती हैं कि पासवान टोला की एक महिला नीलू ने कहा था कि यह उसका पहला प्रसव था, जिसमें उसे काफी सहूलियत हुई। ढेर सारी सुविधाएं मिली और बच्चे को जन्म प्रमाण पत्र भी। अंजू कहती हैं कि संस्थागत प्रसव ने यहां की महिलाओं को जीने का तरीका दिया है।
कमर तक पानी में जाकर पूरा किया सर्वे का काम –
अंजू कहती हैं कि उनके पंचायत के तरफ वाया नदी है जो प्रत्येक साल बाढ़ का पानी लाती है। ऐसे में 2020 में जब कोविड के दौरान घर -घर सर्वे का कार्य करना था तब उन्होंनें कमर तक पानी में जाकर भी सर्वे का कार्य पूरा किया है। वहीं अभी कोविड टीकाकरण के दौरान अपने क्षेत्र में काफी सराहनीय कार्य कर रही हैं। स्वास्थ्य का मुद्दा चाहे जो हो अंजू को देख उनके क्षेत्र के लोग मुस्कुराते जरूर हैं।




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