
राष्ट्रकवि दिनकर जी से प्रेरणा की है जरूरत
राष्ट्रकवि के जन्म दिवस पर विशेष @अमित नयन राज्य-पार्षद एआईएसएफ बिहार
छपरा।
आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि रामधारी सिंह दिनकर जी का आज जन्म दिवस है। इस युग पुरुष का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में 23 सितंबर 1908 को हुआ।
‘दिनकर’ स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद ‘राष्ट्रकवि’ के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है।
रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे। रामधारी सिंह दिनकर जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कुछ नीतियों का विरोध अपनी पंक्तियों के माध्यम से संसद में प्रकट किया।
जिससे देश में भूचाल मच गया था। दिलचस्प बात यह है कि राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की कुछ नीतियों की मुखालफत करने से वे नहीं चूके।
राष्ट्रकवि का एक प्रसंग काफी रोचक है, आजादी रोटी नहीं ,मगर दोनों में कोई बैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं
उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है। उर्वशी को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है। भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है।
अपनी कलम को धारदार हथियार बनाकर राष्ट्र के लिए अपने कर्तव्यों का वाहन करते हुए दिनकर जी 24 अप्रैल 1974 को इस दुनिया से विदा हो गए।
वर्तमान परिपेक्ष में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए है की, आज देश में बड़े स्तर पर कवियों, लेखकों को सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ कुछ लिखने या कहने का साहस लगभग खत्म सा हो गया है। जिसके भिन्न-भिन्न कारण है।
ऐसी परिस्थिति में देश किस दिशा में जाएगा, यह कहने वाली बात नहीं। अक्सर हम सुनते आए हैं, एक प्रसंग ‘जहां न जाए रवि तहां जाए कवि’
इसके कहने का तात्पर्य यह है कि कलमकार की दृष्टि सर्वत्र रहती है। देश की कैसी परिस्थिति है आम जीवन कैसे व्यतीत हो रहा है? इसका प्रतिबिंब कवियों एवं लेखकों के दृष्टि पटल में बन जाता है।
ऐसे समय में देश के कवियों, लेखकों एवं पत्रकारों को दिनकर जी से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के नवनिर्माण एवं प्रगति के लिए सत्ता एवं विपक्ष के गलत नीतियों का विरोध अपनी पंक्तियों एवं लेखों द्वारा किए जाने की आवश्यकता है, तभी हम वास्तविक आजादी के अनुभूति देश के अंतिम व्यक्ति को करा पाएंगे।




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